भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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( ८९ ) परन्तु महाभारत में सर्वत्र 'अठारह दिनों तक युद्ध हुआ' ऐसा ही उल्लेख है । चौदहवें दिन के रात्रियुद्ध में जब कर्ण की शक्ति से घटोत्कच मारा गया, प्राणों को संकट में डालकर शोकग्रस्त धर्मराज युधिष्ठिर कर्ण से युद्ध करने जा रहे थे, तब दिव्यशक्ति सम्पन्न दिव्यदर्शी वेदव्यास ने प्रकट होकर उनसे कहा—'पञ्चमे दिवसे तात पृथिवी ते भविष्यति ।'='हे तात ! पाँचवें दिन पृथिवी तेरी हो जायगी ।' ( द्रोणपर्व १८३।६५ ) कवीश्वर के मत में कृष्ण द्वादशी को रात्रियुद्ध था तथा शुक्ल पञ्चमी को गदायुद्ध । अतः पांच दिनों के स्थान पर नौ दिनों की सिद्धि कैसे संभव है ? अस्तु, यह निर्विवाद सत्य है कि जब उसके बाद लगातार युद्ध हो और अठारहवें दिन युद्ध की समाप्ति हो, तभी श्रीवेदव्यास भगवान् का उक्त वचन सार्थक हो सकता है । कहा जा सकता है कि शल्यवध के बाद लगभग सायंकाल दुर्योधन के द्वैपायन सरोवर को माया से स्तम्भित कर उसमें छिपने का वर्णन है । उसके घंटों बाद पाण्डवों से उसके संभाषण का वर्णन है; फिर रात बीतने पर बलरामजी के गदायुद्ध में सम्मिलित होने का उल्लेख है, इन सबकी संगति कैसे संभव है ? ध्यानपूर्वक इस प्रश्न का उत्तर हृदयंगम करने योग्य है । जिस तरह चौदहवें दिन के रात्रियुद्ध का और सौप्तिक संहार का भी पुष्पिका में रात्रि- युद्ध के रूप में उल्लेख हुआ है, उसी तरह यदि गदायुद्ध रात्रि में हुआ होता तो पुष्पिका में उसका उल्लेख भी 'रात्रियुद्ध' के रूप में ही होता । अथवा दुर्योधन का पता लग जाने पर गदायुद्ध से पूर्व एक रात्रि बीती होती तो उसका उल्लेख भी अवश्य होता । अस्तु ! सन्दर्भ का आद्योपान्त अनुशीलन करने पर यह सिद्ध होता है कि दुर्योधन, भीम, युधिष्ठिर और अश्वत्थामा ने प्रतिज्ञापूर्वक सर्वत्र 'अद्य' (आज) का ही प्रयोग किया है। साथ ही दुर्योधन के धराशायी होने तक 'सायंकाल' का ही उल्लेख किया गया है । इतना ही नहीं, दुर्योधनवध का समाचार