भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( ८८ ) १४. चित्रा चैत्र विश्वकर्मा १५. स्वाति वायुः १६. विशाखा वैशाख अग्नि-इन्द्र १७. अनुराधा मित्र १८. ज्येष्ठा ज्येष्ठ इन्द्र १९. मूल निऋर्ति २०. पूर्वाषाढ़ा आषाढ़ उदक २१. उत्तराषाढ़ा विश्वेदेवाः †२२. श्रवण श्रावण विष्णु २२. धनिष्ठा वसु २४. शतभिषा वरुण २५. पूर्वाभाद्रपदा भाद्रपद अजचरणः २६. उत्तराभाद्रपदा अहिर्बुध्न्य २७. रेवती आश्विन पूषा परिशिष्ट श्री० ग० वा० कवीश्वर 'महाभारत युद्ध के कालगणनात्मक रहस्य' नामक पुस्तक में भगवान् श्रीकृष्ण के 'सप्तमाच्चापि दिवसाद्‌अमावास्या भविष्यति' ( उद्योग० १४२।१८ ) इस वचन को प्रमाण मानकर मार्गशीर्ष अमावास्या को युद्धारम्भ मानते हैं। उसके बाद एक-एक दिन अवकाश देकर पौष शुक्ल पञ्चमी को श्रवण नक्षत्र में युद्धान्त मानते हैं। इस मत में पौष कृष्ण द्वादशी को जयद्रथवध के बाद रात्रियुद्ध के कारण अवकाश का क्रम खण्डित होता है। कवीश्वर जी शल्यवध के दूसरे दिन ( युद्ध के उन्नीसवें दिन ) दुर्योधन- वध और सौप्तिक संहार मानते हैं। क्योंकि श्रीबलरामजी की तीर्थयात्रा के प्रसंग में महाभारत की कुछ प्रतियों के अनुसार शल्यवध का समाचार गदायुद्ध के एक दिन पूर्व ही श्रीबलरामजी को प्राप्त होता है। उसके बाद वे एक रात तीर्थ में निवास कर देवर्षि नारद से प्रेरित होकर भीमसेन और दुर्योधन के गदायुद्ध में दर्शक के रूप में सम्मिलित होते हैं। † अभिजित् विधि