भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 115 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 113

( १०२ ) इसी तरह श्रीव्यासजी द्वारा की गयी भविष्य वाणी का रहस्योद्घाटन पहले ही किया जा चुका है । कर्ण वध के दिन पहले ही भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सावधान करते हुए कहा—आज तुम्हारे हाथों कर्ण का वध होना है । इसी प्रकार दुर्योधन के धराशायी होने पर धर्मराज प्रेरित श्री कृष्ण ने हस्तिनापुर में देवी गान्धारी और राजा धृतराष्ट्र को सान्त्वना देने के अनन्तर सहसा कुरुक्षेत्र के लिये प्रस्थान करना चाहा और उन्होंने श्रीवेद- व्यासजी के सम्मुख कहा—'आज अश्वत्थामा पाण्डवों का नाश करना चाहता है, अतः उनकी रक्षा के लिये मुझे अति शीघ्र चलना है ।' अस्तु ! क्योंकि विधाता के विधान में धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा ही शल्यवध होना था, अतः दिव्यदर्शी धर्मराज ने भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेरणा से हिमाल- यान पर हो रहे शल्याभिषेक का शब्द सुना । स्वयं युधिष्ठिर ने अनुस्मृति विद्या के प्रसङ्ग में उनकी दिव्यदर्शिता का रहस्योद्घाटन किया है— देवर्षिर्लोमशो दृष्टस्ततः प्राप्तोऽस्म्यनुस्मृतिम् । दिव्यं चक्षुरपि प्राप्तम् ज्ञानयोगेन वै पुरा ॥ ( स्त्रीपर्व २६।२० ) 'तीर्थ यात्रा के प्रसङ्ग में देवर्षि लोमश का दर्शन हुआ था । उन्हीं से मैने यह अनुस्मृति विद्या प्राप्त की थी । इसके अतिरिक्त, पूर्वकाल में ज्ञानयोग के प्रभाव से मुझे दिव्य दृष्टि भी प्राप्त हो गयी थी ।' जब द्रोणाचार्य दिव्यवपु ब्रह्मलोक के लिए उत्क्रमण कर रहे थे, तब दिव्य- दर्शी धर्मराज ने भी उनका दर्शन किया— ब्रह्मलोकगते द्रोणे धृष्टद्युम्ने च मोहिते । वयमेव तदाद्राक्ष्म पञ्च मानुषयोनयः ॥ योगयुक्तं महात्मानं गच्छन्तं परमां गतिम् । अहं धनंजयः पार्थो कृपः शारद्वतस्तथा ॥ वासुदेवश्च वार्ष्णेयो धर्मपुत्रश्च पाण्डवः । अन्ये तु सर्वे नापश्यन् भारद्वाजस्य धीमतः । महिमानं महाराज योगयुक्तस्य गच्छतः ॥ ( द्रोण० १९२।५५½—५८½ )