काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०३ ) ‘अपमान से धृष्टद्युम्न के मोहित हो जाने पर द्रोणाचार्य के ब्रह्मलोक जाते समय मैं ( संजय ), कुन्तीपुत्र अर्जुन, शरद्वान् के पुत्र कृपाचार्य, वृष्णिवंशी भगवान् श्रीकृष्ण तथा धर्मपुत्र पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर—इन पांच मनुष्यों ने ही योगयुक्त महात्मा द्रोण को परम धाम की ओर जाते देखा था। अन्य सब लोगों ने योगयुक्त हो ऊर्ध्वगति को जाते हुए बुद्धिमान् द्रोणाचार्य की महिमा का साक्षात्कार नहीं किया ॥' इस तरह कवीश्वरजी ने जो अवकाश की सिद्धि में प्रमाण प्रस्तुत किये हैं, वे सब अवकाश न होने में वज्रहेतु हैं। पन्द्रहवें दिन के बाद एक-एक दिन अवकाश और शल्यवध के दूसरे दिन दुर्योधनवध की बात कौन कहे, केवल एक अवकाश मानने पर भी—‘पञ्चमे दिवसे तात पृथिवी ते भविष्यति' द्रो० प० १८३।६५, यह व्यास वचन सर्वथा खण्डित होता है। इतना ही नहीं, चित्रा नक्षत्र में मार्गशीर्ष की अमावास्या मानने के कारण आद्योपान्त तिथि और नक्षत्र का योग असन्तुलित होता है। पुष्य में मार्गशीर्ष कृष्ण सप्तमी मानने के कारण कार्तिकी पूर्णिमा अश्विनी में सिद्ध होती है । इसी तरह कृत्तिका में मार्गशीर्ष की पूर्णिमा मानना भी अनुचित है । इतना ही नहीं, एक ओर तो मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष में दो तिथियों का क्षय माना है, दूसरी ओर एक नक्षत्र की वृद्धि भी मानी है। यह सब अनर्थ चित्रा को ऐन्द्र नक्षत्र मानने से हुआ है । कवीश्वर ने भीष्म निर्वाण सम्बन्धी दो वचनों की सार्थकता पर कोई ध्यान ही नहीं दिया है। इनके मत में भीष्माचार्य के पास श्रीकृष्ण सहित पाण्डव माघ शुक्ला नवमी को पहुँचते हैं। ऐसा मानने पर ‘पञ्चाशतं षट्' का अर्थ--नवमी सहित पूर्णिमा तक सात दिन अथवा दशमी से पूर्णिमा तक छह दिन सिद्ध होता है। ये दशमी से पूर्णिमा तक उपदेश मानते हैं। परन्तु ऐसी स्थिति में तो ‘उषित्वा शर्वरीः श्रीमान् पञ्चाशन्नगरोत्तमे' के अनुसार उपदेश श्रवण के पश्चात् पाण्डवों के हस्तिनापुर में निवास सम्बन्धी वचन ही निरर्थक सिद्ध हो जाता है। यहाँ यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि श्रीभगवान् के 'सप्तमा- च्छापिदिवसादमावास्या भविष्यति' ( उद्योग० १४९।१८ ) इस वचन को