काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११ ) बेवर की दृष्टि में पाणिनि के साहित्य से वासुदेव, अर्जुन आदि का उल्लेख होने पर भी भारत या महाभारत का उल्लेख नहीं है; अतः पाणिनि के समय तक महाभारत की रचना नहीं हुई । मेगस्थनीज ने भी भारत महाभारत का उल्लेख नहीं किया, सुतरां पाणिनि पूर्वभावी आश्वलायन के गृह्यसूत्र में भारत, महाभारत का उल्लेख प्रक्षिप्त है । लुडविग ने सन् १८८४ से महाभारत पर विचार प्रारम्भ किया । उनकी राय में न तो महाभारत कोई इतिहास है और न तो पाण्डव ऐतिहासिक पुरुष । पाण्डु का अभिप्राय है पीला सूर्य, धृतराष्ट्र के अन्धेपन का अर्थ है शरत्कालीन सूर्य और गान्धारी की आंखों पर पट्टियां बांधने का अर्थ है सूर्य का बादलों में छिप जाना तथा वसन्त के सूर्य का नाम कृष्ण । होज्यान ने कहा है कि--'पाण्डव और उनके पक्षपाती कृष्ण छली कपटी थे । उन्हीं लोगों की ओर से युद्ध में छल हुआ । कौरवों का नाम वेद और ब्राह्मणों में आता है अतः वे प्राचीन हैं । वे ही धर्मभीरु और न्यायप्रिय हैं । 'किसी ने बौद्ध राजा, सम्भवतः अशोक, की प्रशंसा में एक काव्य लिखा । ब्राह्मणों द्वारा बौद्धधर्म का पराभव होने पर ब्राह्मणों ने उस काव्य में कुछ हेर-फेर कर उसे अपने साँचे में ढाल लिया तथा कौरवों की प्रशंसा पाण्डवों के नाम कर दी और धीरे-धीरे बौद्धधर्म का नाम भी उड़ा दिया ।' मैक्समूलर ने कुछ अंशों में लासेन के मत का अनुसरण किया और उनकी दृष्टि में महाभारत एक कवि की कृति नहीं है । परन्तु उसके सभी रचयिता- गण मनुप्रोक्त धर्म के पक्के अनुयायी ब्राह्मण रहे होंगे । ब्राह्मण सम्प्रदाय में शिक्षा होने पर भी पाँचो भाई एक स्त्री से विवाह कर बैठे । प्रत्यक्ष धर्म विरुद्ध इस घटना पर ब्राह्मण सम्पादकों ने तरह-तरह के रङ्ग चढ़ाये परन्तु यह छिपा न रह सका । बुल्हर के अनुसार महाभारत कोई इतिहास या पुराण नहीं । ब्राडर का कहना है कि ईसा के जन्म से ५०० या ४०० वर्ष पहले जब ब्रह्मा सर्वप्रधान देवता माने जाते थे, उस समय आदि कवि ने कुरुभूमि में जन्म