भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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( १२ ) ग्रहण किया होगा । वह गायक रहा होगा । उसने लोगों के मुख से अज्ञात जाति के साथ कुरुवंश की पराजय सुनी होगी । उसी वियोगान्त घटना के आधार पर उसने स्वदेशी वीरों को क्षात्रधर्म के मूर्तिमान् आदर्श तथा यदुवंशी वीर कृष्ण के साथ पाण्डव, मत्स्य आदि विजातियों को नीच कुलोद्भव और अन्याय से विजयी बतलाकर चित्रित किया होगा । वही प्राचीन भारतगान आश्वलायनगृह्यसूत्र में उल्लिखित है । उसके बहुत समय बाद कृष्णजन्म के अनन्तर कृष्णभक्त पुरोहितों ने बुद्ध के विरुद्ध कृष्ण या विष्णु को खड़ा किया । पाण्डुवंशियों की सहायता से पुरोहितो की चेष्टाएँ सफल हुईं, और चौथी शताब्दी में विष्णु ही प्रधान देव हुए । फिर तो पुरोहितों ने आदि महाभारत में पाण्डवों की अपकीर्ति को कीर्तिरूप में और उनके विपक्षी कुरुओं की कीर्ति को निन्दारूप में बदलकर आदि महाभारत का कलेवर परिवर्तित कर दिया, और दाक्षिणात्य पाण्डुवंश की एक शाखा के रूप में मान लिया ।' डेन्मार्क के डाक्टर सोर्यनसन कोपेन हेगेन विश्वविद्यालय के अध्यापक थे । 'महाभारत और भारतीय संस्कृति में उसका स्थान' शीर्षक निबन्ध लिखने के कारण उन्हें आचार्य पदवी मिली । वे महाभारत का मूल कोई प्राचीन पौराणिक गाथा और उसका रचयिता एक ही व्यक्ति मानते हैं ।' बुल्हर कोजे नेसिस दे ने महाभारत को कई पीढ़ियों में धीरे-धीरे विकसित काव्य माना है । किन्तु उसकी रचना एक ही समय में सम्पादक मण्डल द्वारा वे मानते हैं । वे युद्ध को कोरी कवि कल्पना मानते हैं । उनका कहना है कि महाभारत एक रूपक है, जिसमें पाण्डव धर्म के कौरव अधर्म के प्रतिनिधि रूप में दिखाये गये हैं । उनके शिष्य डालमान ने उनके सिद्धान्तों की पूर्ण व्याख्या करते हुए बताया है कि पहले दो प्रकार के साहित्य रहे होंगे:--( १ ) राजवंशों की पौराणिक गाथायें और ( २ ) उपदेशपरक कवितायें । सर्वसाधारण में प्रचार की दृष्टि से इन दोनों भावों को मिलाकर कविमण्डल ने एक नवीन रचना कर दी, वही महाभारत है । यह सब पाश्चात्यों का आक्षेप है ।

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