भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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समाधान वस्तुतः वे लोग ईसाई मत के प्रचार को ध्यान में रखकर हम लोगों के साहित्यों को देखते हैं, विचार करते हैं और मनमानी कल्पना की उड़ान भरते हैं किन्तु प्रमाण कुछ भी उपस्थित नहीं करते जिससे उनकी बात प्रमाण की कसौटी पर खरी उतरे । वस्तुतः अतीत व्यक्तियों एवं घटनाओं के सम्बन्ध में इतिहास को छोड़कर और कोई भी दूसरा प्रमाण हो नहीं सकता । अटकल मात्र से न तो कुछ सिद्ध ही होगा और न विद्वानों को सन्तोष ही । जबकि जिस ग्रन्थ के विषय में अटकल लगायी जा रही है उस ग्रन्थ से ही वह अटकल विरुद्ध ठहरता है । महाभारत में ही जय, भारत या महाभारत का निर्माता कृष्णद्वैपायन व्यास को ही कहा गया है तथा महाभारत के निर्माण का समय भी उसमें दिया है । फिर उसके विरुद्ध अटकलबाजी का क्या महत्त्व हो सकता है ? इन सभी पाश्चात्यों की अटकलबाजी भी परस्पर विरुद्ध ही हैं । कोई महा- भारत को एक कर्तृक, कोई अनेक कर्तृक, कोई एक काल में निर्मित और कोई भिन्न-भिन्न काल में निर्मित मानते हैं । उनकी दुरभिसन्धि का यह जाज्वल्यमान उदाहरण है कि पाणिनि ने अष्टाध्यायी में 'महान् व्रीह्यपराह्णगृष्टीष्वासजाबालभारभारतहैलहिलरौरव- प्रवृद्धेषु' ( पा० ६।२।३८ ) में महाभारत का स्मरण किया है, अतः पाणिनि द्वारा उल्लेख न होने से आश्वलायन गृह्यसूत्र में भारत-महाभारत का नाम क्षेपक हैं यह ठीक नहीं । व्रीहि, अपराह्ण, गृष्टि, इष्वास, जाबाल भार भारत हैलहिल, रौरव और प्रवृद्ध शब्द परे ( बाद में ) रहें तो महान् शब्द को अन्तोदात्त स्वर होता है । जैसे महाव्रीहि, महापराह्ल आदि में अन्तोदात्त होता है, वैसे ही महाभारत में भारत शब्द परे रहते महान् शब्द को अन्तोदात्त होता है । इस सूत्र से पाणिनि ने महाभारत शब्द बनाया है । फिर बेवर द्वारा यह कहना कि पाणिनि ने भारत-महाभारत का स्मरण नहीं किया यह अत्यन्त प्रमाद है ।

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