काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४ ) उनके पास एक भी ठोस प्रमाण नहीं है जिससे वे लोग अपनी अटकलबाजी को प्रमाण की कसौटी पर खरी उतार सकें । उसके विपरीत हमारे महाभारतानन्तर भावी सभी साहित्यों में महाभारत का और उसके व्यास कर्तृत्व का उल्लेख मिलता है; जिसका उल्लेख पहले किया जा चुका है । श्रुतियों में जहाँ विरोधाभास दीखता है अर्थात् परस्पर विरुद्धार्थक दो श्रुतियाँ दीखती हैं वहाँ समन्वय से उनका अर्थ किया जाता है । उत्तरमीमांसा में तो समन्वयाध्याय एक अध्याय ही व्यास जी ने रखा है । पूर्व मीमांसा में भी समन्वय बताया गया है । उसी पद्धति से महाभारतादि में भी समन्वय करना चाहिए । जो हमारी चीज है; हमारे लाखों पीढ़ी करोड़ों पीढ़ी के पूर्वजों से हमें प्राप्त है उसके अर्थ का प्रकार हमलोगों से ही समझना चाहिए । मनमानी अटकल नहीं भिड़ानी चाहिए । धर्म में वही इतिहास प्रमाण रूप से आदरणीय होते हैं जो धर्मशास्त्र के अविरुद्ध होते हैं । आधुनिक समय में भी संविधान व्यवहार के अनुसार होता है, इतिहास के अनुसार नहीं । क्योंकि इतिहास दुर्भाग्यपूर्ण भी हो सकता है । भारतीयों के अनुसार जो महाभारत में है, वही अन्यत्र है । जो महाभारत में नहीं वह कहीं नहीं । “यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्” । आश्वलायन गृह्यसूत्र के तर्पण के प्रसङ्ग में ‘सुमन्तुजैमिनिवैशम्पायनपैल- सूत्रभाष्यभारतमहाभारतधर्माचार्याः’ यह कहा है । इसका अर्थ है कि सुमन्तु, जैमिनि, वैशम्पायन, पैल, सूत्र, भाष्य, भारत और महाभारत नाम के धर्माचार्य तृप्त हों । ये भारत और महाभारत धर्माचार्य हैं, कोई ग्रन्थ नहीं । देवी भागवत महापुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के बीसवें अध्याय में इस सूत्र की व्याख्या है । ‘सुमन्तुजैमिनिवैशम्पायनः पैलसूत्रयुक् । भाष्यभारतपूर्णश्च महाभारत इत्यपि ॥ धर्माचार्या इमे सर्वे तृप्यन्त्विति च कीर्तयेत् ॥ २० ॥’ इसकी टीका में नीलकण्ठ कहते हैं—सुमन्तु जैमिनि वैशम्पायनपैलसूत्र- भाष्यभारतमहाभारतधर्माचार्यास्तृप्यन्तु इत्येको मन्त्रः सूत्रानुरोधात् । अर्थात् ये