काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 22, कुल 115 में से
संदर्भ में पढ़ें( १५ ) सब धर्माचार्य हैं एक ही में सबका नाम लेकर तर्पण करना चाहिए। क्योंकि सूत्र में वैसा ही कहा गया है। इसी प्रकार कलियुग में कब्र की पूजा होगी; लोग देवता पूजन नहीं करेंगे। स्थान-स्थान पर कब्र ही दृष्टिगोचर होंगी, मन्दिर कम दीखेंगे। यह सब महाभारत में देखकर कुछ लोगों ने कहा कि बुद्ध के मरने के बाद उनका शरीर दफनाया गया उसके बाद ये श्लोक पीछे से जुड़े हैं। किन्तु ऐसी बात नहीं है। मार्कण्डेयमहर्षि कलियुग में भविष्य कैसा होता है यह बता रहे हैं। उन्होंने कई प्रलय देखे हैं उस प्रसङ्ग में ये श्लोक कहे गये हैं। 'एडूकान् पूजयिष्यन्ति वर्जयिष्यन्ति देवताः।' ६५।७ ( म० भा० वनपर्व १९० ) 'एडूकचिह्ना पृथ्वी न देवगृहभूषिता।' भविष्यति युगे क्षीणे तद्युगान्तस्य लक्षणम्॥ ( ६७।७ ( म० भा० वनपर्व १९० ) इसी का समर्थन विष्णु, वायु, मत्स्य पुराण से होता है। महाभारत से आज तक पौराणिक राजवंशावलियों और महाभारत संहिता आदि संस्कृत ग्रन्थों से प्रमाणित कलियुगारम्भ काल (जो कि विक्रमसंवत् पूर्व ३०४५ से ईस्वी सन् पूर्व ३१०२ है) वह ही महाभारत युद्ध काल है और वह ही परीक्षित का जन्मकाल है। महाराज युधिष्ठिर के समकालीन मगध देश के महाराज जरासन्ध के पौत्र और महाराज रुद्रदेव के पुत्र सोमाधि (अथवा सोमापि) से लेकर इस वंश के २२ वें राजा अरिंजय (अथवा रिपुंजय) तक का राज्यकाल एक सहस्र वर्ष ही पुराणों के अनुसार सिद्ध होता है। इस वंश के अनन्तर प्रद्योत वंश प्रारम्भ होता है। इस वंश में प्रद्योत वंश से लेकर नन्दिवर्धन तक ५ राजा हुए हैं। इनका राजत्व (शासन) काल १३८ वर्ष है।