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काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

( १२ ) ग्रहण किया होगा । वह गायक रहा होगा । उसने लोगों के मुख से अज्ञात जाति के साथ कुरुवंश की पराजय सुनी होगी । उसी वियोगान्त घटना के आधार पर उसने स्वदेशी वीरों को क्षात्रधर्म के मूर्तिमान् आदर्श तथा यदुवंशी वीर कृष्ण के साथ पाण्डव, मत्स्य आदि विजातियों को नीच कुलोद्भव और अन्याय से विजयी बतलाकर चित्रित किया होगा । वही प्राचीन भारतगान आश्वलायनगृह्यसूत्र में उल्लिखित है । उसके बहुत समय बाद कृष्णजन्म के अनन्तर कृष्णभक्त पुरोहितों ने बुद्ध के विरुद्ध कृष्ण या विष्णु को खड़ा किया । पाण्डुवंशियों की सहायता से पुरोहितो की चेष्टाएँ सफल हुईं, और चौथी शताब्दी में विष्णु ही प्रधान देव हुए । फिर तो पुरोहितों ने आदि महाभारत में पाण्डवों की अपकीर्ति को कीर्तिरूप में और उनके विपक्षी कुरुओं की कीर्ति को निन्दारूप में बदलकर आदि महाभारत का कलेवर परिवर्तित कर दिया, और दाक्षिणात्य पाण्डुवंश की एक शाखा के रूप में मान लिया ।' डेन्मार्क के डाक्टर सोर्यनसन कोपेन हेगेन विश्वविद्यालय के अध्यापक थे । 'महाभारत और भारतीय संस्कृति में उसका स्थान' शीर्षक निबन्ध लिखने के कारण उन्हें आचार्य पदवी मिली । वे महाभारत का मूल कोई प्राचीन पौराणिक गाथा और उसका रचयिता एक ही व्यक्ति मानते हैं ।' बुल्हर कोजे नेसिस दे ने महाभारत को कई पीढ़ियों में धीरे-धीरे विकसित काव्य माना है । किन्तु उसकी रचना एक ही समय में सम्पादक मण्डल द्वारा वे मानते हैं । वे युद्ध को कोरी कवि कल्पना मानते हैं । उनका कहना है कि महाभारत एक रूपक है, जिसमें पाण्डव धर्म के कौरव अधर्म के प्रतिनिधि रूप में दिखाये गये हैं । उनके शिष्य डालमान ने उनके सिद्धान्तों की पूर्ण व्याख्या करते हुए बताया है कि पहले दो प्रकार के साहित्य रहे होंगे:--( १ ) राजवंशों की पौराणिक गाथायें और ( २ ) उपदेशपरक कवितायें । सर्वसाधारण में प्रचार की दृष्टि से इन दोनों भावों को मिलाकर कविमण्डल ने एक नवीन रचना कर दी, वही महाभारत है । यह सब पाश्चात्यों का आक्षेप है ।

समाधान वस्तुतः वे लोग ईसाई मत के प्रचार को ध्यान में रखकर हम लोगों के साहित्यों को देखते हैं, विचार करते हैं और मनमानी कल्पना की उड़ान भरते हैं किन्तु प्रमाण कुछ भी उपस्थित नहीं करते जिससे उनकी बात प्रमाण की कसौटी पर खरी उतरे । वस्तुतः अतीत व्यक्तियों एवं घटनाओं के सम्बन्ध में इतिहास को छोड़कर और कोई भी दूसरा प्रमाण हो नहीं सकता । अटकल मात्र से न तो कुछ सिद्ध ही होगा और न विद्वानों को सन्तोष ही । जबकि जिस ग्रन्थ के विषय में अटकल लगायी जा रही है उस ग्रन्थ से ही वह अटकल विरुद्ध ठहरता है । महाभारत में ही जय, भारत या महाभारत का निर्माता कृष्णद्वैपायन व्यास को ही कहा गया है तथा महाभारत के निर्माण का समय भी उसमें दिया है । फिर उसके विरुद्ध अटकलबाजी का क्या महत्त्व हो सकता है ? इन सभी पाश्चात्यों की अटकलबाजी भी परस्पर विरुद्ध ही हैं । कोई महा- भारत को एक कर्तृक, कोई अनेक कर्तृक, कोई एक काल में निर्मित और कोई भिन्न-भिन्न काल में निर्मित मानते हैं । उनकी दुरभिसन्धि का यह जाज्वल्यमान उदाहरण है कि पाणिनि ने अष्टाध्यायी में 'महान् व्रीह्यपराह्णगृष्टीष्वासजाबालभारभारतहैलहिलरौरव- प्रवृद्धेषु' ( पा० ६।२।३८ ) में महाभारत का स्मरण किया है, अतः पाणिनि द्वारा उल्लेख न होने से आश्वलायन गृह्यसूत्र में भारत-महाभारत का नाम क्षेपक हैं यह ठीक नहीं । व्रीहि, अपराह्ण, गृष्टि, इष्वास, जाबाल भार भारत हैलहिल, रौरव और प्रवृद्ध शब्द परे ( बाद में ) रहें तो महान् शब्द को अन्तोदात्त स्वर होता है । जैसे महाव्रीहि, महापराह्ल आदि में अन्तोदात्त होता है, वैसे ही महाभारत में भारत शब्द परे रहते महान् शब्द को अन्तोदात्त होता है । इस सूत्र से पाणिनि ने महाभारत शब्द बनाया है । फिर बेवर द्वारा यह कहना कि पाणिनि ने भारत-महाभारत का स्मरण नहीं किया यह अत्यन्त प्रमाद है ।

( १४ ) उनके पास एक भी ठोस प्रमाण नहीं है जिससे वे लोग अपनी अटकलबाजी को प्रमाण की कसौटी पर खरी उतार सकें । उसके विपरीत हमारे महाभारतानन्तर भावी सभी साहित्यों में महाभारत का और उसके व्यास कर्तृत्व का उल्लेख मिलता है; जिसका उल्लेख पहले किया जा चुका है । श्रुतियों में जहाँ विरोधाभास दीखता है अर्थात् परस्पर विरुद्धार्थक दो श्रुतियाँ दीखती हैं वहाँ समन्वय से उनका अर्थ किया जाता है । उत्तरमीमांसा में तो समन्वयाध्याय एक अध्याय ही व्यास जी ने रखा है । पूर्व मीमांसा में भी समन्वय बताया गया है । उसी पद्धति से महाभारतादि में भी समन्वय करना चाहिए । जो हमारी चीज है; हमारे लाखों पीढ़ी करोड़ों पीढ़ी के पूर्वजों से हमें प्राप्त है उसके अर्थ का प्रकार हमलोगों से ही समझना चाहिए । मनमानी अटकल नहीं भिड़ानी चाहिए । धर्म में वही इतिहास प्रमाण रूप से आदरणीय होते हैं जो धर्मशास्त्र के अविरुद्ध होते हैं । आधुनिक समय में भी संविधान व्यवहार के अनुसार होता है, इतिहास के अनुसार नहीं । क्योंकि इतिहास दुर्भाग्यपूर्ण भी हो सकता है । भारतीयों के अनुसार जो महाभारत में है, वही अन्यत्र है । जो महाभारत में नहीं वह कहीं नहीं । “यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्” । आश्वलायन गृह्यसूत्र के तर्पण के प्रसङ्ग में ‘सुमन्तुजैमिनिवैशम्पायनपैल- सूत्रभाष्यभारतमहाभारतधर्माचार्याः’ यह कहा है । इसका अर्थ है कि सुमन्तु, जैमिनि, वैशम्पायन, पैल, सूत्र, भाष्य, भारत और महाभारत नाम के धर्माचार्य तृप्त हों । ये भारत और महाभारत धर्माचार्य हैं, कोई ग्रन्थ नहीं । देवी भागवत महापुराण के ग्यारहवें स्कन्ध के बीसवें अध्याय में इस सूत्र की व्याख्या है । ‘सुमन्तुजैमिनिवैशम्पायनः पैलसूत्रयुक् । भाष्यभारतपूर्णश्च महाभारत इत्यपि ॥ धर्माचार्या इमे सर्वे तृप्यन्त्विति च कीर्तयेत् ॥ २० ॥’ इसकी टीका में नीलकण्ठ कहते हैं—सुमन्तु जैमिनि वैशम्पायनपैलसूत्र- भाष्यभारतमहाभारतधर्माचार्यास्तृप्यन्तु इत्येको मन्त्रः सूत्रानुरोधात् । अर्थात् ये

( १५ ) सब धर्माचार्य हैं एक ही में सबका नाम लेकर तर्पण करना चाहिए। क्योंकि सूत्र में वैसा ही कहा गया है। इसी प्रकार कलियुग में कब्र की पूजा होगी; लोग देवता पूजन नहीं करेंगे। स्थान-स्थान पर कब्र ही दृष्टिगोचर होंगी, मन्दिर कम दीखेंगे। यह सब महाभारत में देखकर कुछ लोगों ने कहा कि बुद्ध के मरने के बाद उनका शरीर दफनाया गया उसके बाद ये श्लोक पीछे से जुड़े हैं। किन्तु ऐसी बात नहीं है। मार्कण्डेयमहर्षि कलियुग में भविष्य कैसा होता है यह बता रहे हैं। उन्होंने कई प्रलय देखे हैं उस प्रसङ्ग में ये श्लोक कहे गये हैं। 'एडूकान् पूजयिष्यन्ति वर्जयिष्यन्ति देवताः।' ६५।७ ( म० भा० वनपर्व १९० ) 'एडूकचिह्ना पृथ्वी न देवगृहभूषिता।' भविष्यति युगे क्षीणे तद्युगान्तस्य लक्षणम्॥ ( ६७।७ ( म० भा० वनपर्व १९० ) इसी का समर्थन विष्णु, वायु, मत्स्य पुराण से होता है। महाभारत से आज तक पौराणिक राजवंशावलियों और महाभारत संहिता आदि संस्कृत ग्रन्थों से प्रमाणित कलियुगारम्भ काल (जो कि विक्रमसंवत् पूर्व ३०४५ से ईस्वी सन् पूर्व ३१०२ है) वह ही महाभारत युद्ध काल है और वह ही परीक्षित का जन्मकाल है। महाराज युधिष्ठिर के समकालीन मगध देश के महाराज जरासन्ध के पौत्र और महाराज रुद्रदेव के पुत्र सोमाधि (अथवा सोमापि) से लेकर इस वंश के २२ वें राजा अरिंजय (अथवा रिपुंजय) तक का राज्यकाल एक सहस्र वर्ष ही पुराणों के अनुसार सिद्ध होता है। इस वंश के अनन्तर प्रद्योत वंश प्रारम्भ होता है। इस वंश में प्रद्योत वंश से लेकर नन्दिवर्धन तक ५ राजा हुए हैं। इनका राजत्व (शासन) काल १३८ वर्ष है।

( १६ ) प्रद्योत वंश के अनन्तर शिशुनाग वंश का राज्य प्रारम्भ होता है। इस वंश में शिशुनाग से लेकर महानन्दी तक १० राजा हुये हैं। इनका शासन काल ३६२ वर्ष है। यह सब संख्या १०० + १३८ + ३६२ = १५०० होती है। इन १५०० वर्षों के बाद महापद्मानन्द के वंश का राज्य है। स्वयं महा- पद्मनन्द का राज्य ८८ वर्ष और उनके सुमाल्यादि ८ लड़कों का राज्य १२ वर्ष अर्थात् लड़कों सहित महापद्मानन्द के राज्य का समय १०० वर्ष है। यह युधिष्ठिर संवत् या कलि संवत् १६०० वर्ष तक का राज्यकाल है। कलि संवत् १६०१ में मौर्य वंश ( चन्द्रगुप्त ) का राज्यकाल प्रारम्भ होता है। यह काल विक्रम संवत् पूर्व १४४५ वर्ष और ईसा पूर्व १५०२ वर्ष होता है। इस प्रकार कलि संवत् प्रारम्भ के समय से मगध राजवंश के २२, प्रद्योत वंश के ५ और शिशुनाग वंश के दश तथा महापद्मानन्द के दो कुल ३९ राजा होते हैं। चालीसवाँ राजा मौर्य वंश का चन्द्रगुप्त है। इस वंश में दश राजा हुये हैं जिनका शासन काल १३७ वर्ष है। यहाँ तक का समय युधिष्ठिर संवत् अथवा कलि संवत् १७३७ तक होता हैं। इसके बाद शुङ्गवंश का राजत्व काल है जिसमें पुष्यमित्रादि दश राजा हुए हैं। इनका शासन काल ११२ वर्ष है। इसके बाद कण्व वंश का राजत्व काल है। इसमें वसुदेवादि चार राजा हुए हैं। इनका शासन काल ४५ वर्ष है। इसके अनन्तर आंध्रवंश का शासन काल है। इसमें बलिपुच्छकादि तीस राजा हुए हैं। इनका शासन काल ४५६ वर्ष है। ११२ + ४५ + ४५६ = ६१३ वर्ष। यह समय युधिष्ठिर संवत् २३५० तक होता है। युधिष्ठिर संवत् २३५१ में आभीरवंशी राजाओं का राज्य प्रारम्भ होता है जो विक्रम संवत् पूर्व ६९५ वर्ष और ईसा पूर्व ७५२ वर्ष है। ऊपर कहा जा चुका है कि मौर्य वंशीय चन्द्रगुप्त का राज्यकाल युधिष्ठिर संवत् अथवा कलि संवत् १६०१ से प्रारम्भ होता है। इसका शासन काल २४ वर्ष है। अर्थात् विक्रम संवत् पूर्व १४४४ और ईसा पूर्व १५०१ वर्ष में चन्द्रगुप्त का शासन काल प्रारम्भ होकर कलि संवत् (या युधिष्ठिर संवत्) १६२४ विक्रम पूर्व १४२० ईसा पूर्व १४७७ में समाप्त होता है। कलि संवत्

( १७ ) (या युधिष्ठिर संवत्) १६२५ विक्रम पूर्व संवत् १४२१ वर्ष तथा ईसा पूर्व १४७७ में विन्दुसार का शासन प्रारम्भ होता है। इसके बाद अशोक का शासन काल कलि संवत् (या युधिष्ठिर संवत्) १६५०, विक्रम संवत् पूर्व १३९५, ईसा पूर्व १४५२ से प्रारम्भ होकर २६ वर्ष अर्थात् कलि संवत् (या युधिष्ठिर संवत्) १६७६ तक अर्थात् विक्रम संवत् पूर्व १३६९ ईसा पूर्व १४२६ वर्ष तक है। ऐसी स्थिति में पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन काल ईसा पूर्व ३२३ वर्ष की कल्पना निराधार है। भारतीय इतिहासों के अन्वेषण के लिए सर्वप्रथम 'एशियाटिक सोसाइटी' कलकत्ता, संस्था की स्थापना हुई। इसमें सर विलियम जोन्स ने भारतीय इतिहास के विषय में सर्वप्रथम एक वक्तव्य दिया था। उसमें उन्होंने यूनानी इतिहास लेखकों की नगरी 'पालिबोथ्रा' को पाटलिपुत्र का अपभ्रंश और 'सेण्ड्रा कोटस' को पौराणिक मौर्य वंशीय चन्द्रगुप्त का अपभ्रंश बताया था तथा चन्द्रगुप्त का राज्यारोहण काल ईस्वी सन् पूर्व ३२२ वर्ष सिद्ध किया था। अब इस पर विचार करना चाहिए कि यह कहाँ तक उचित है? मेगस्थनीज का भारत भ्रमण (जो हिन्दी में आचार्य पं० रामचन्द्र शुक्ल द्वारा अनूदित हुआ है) में लिखा है—'डायनुशस पश्चिम से आया। .... .... .... .... उसी वंश में हेराक्लीज .... .... .... भी हुआ था, जो साधारण मनुष्यों से बल बुद्धि में बड़ा था और उसने बहुत सी स्त्रियों से विवाह करके बहुत से पुत्र उत्पन्न किये .... ....। उसने बहुत से नगर बसाये, जिसमें सबसे बड़ा और विख्यात नगर पालिबोथ्रा है। महाभारत मीमांसा पृ० ९१ में मेगस्थनीज की पुस्तक का अवतरण दिया हुआ है। उसमें हेराक्लीज से सेण्ड्राकांटस तक १३८ पीढ़ियां दी हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि सेण्ड्राकांटस से १३८ पीढ़ी पहले 'पालिबोथ्रा' बसी थी। प्रसिद्ध इतिहास विशारद प्लायनी ने लिखा है कि पालिबोथ्रा नगर गंगा और इरानावोसस के संगम से २०० मील ऊपर की ओर स्थित था। एस० डी० आनविल्ले के मत से 'ईरानावोसस' यमुना नदी है। इससे यह सिद्ध २

( १८ ) होता है कि गंगा, यमुना के संगम से २०० मील ऊपर की ओर पालिबोधा बसी थी । सर विलियम जोंस के वक्तव्य के अनुसार आरायन के मत से गंगा और ईरानावोअस का संगम प्रसई ( प्रस्सी ) जनपद में था । कर्टियस का मत है कि मेगस्थनीज का पालिबोधा प्रमद्रक ( या पारिभद्रक ) जनपद है । उपर्युक्त विवरण से यह सिद्ध होता है कि गंगा यमुना के संगम से ऊपर २०० मील पर पालिबोधा नगरी सेण्ड्राकांटस से लगभग २८ सौ वर्ष पहले बसाई गई थी । आधुनिक विद्वानों के अनुसार प्रतिपीढ़ी २० वर्ष मानने पर १३८ पीढ़ी में २७६० वर्ष होते हैं । वर्तमान में पाटलिपुत्र प्रयाग से लगभग ढाई सौ मील नीचे की ओर है । पुराणों के अनुसार शिशुनाग वंश के आठवें राजा उदायी (अथवा उदासी) ने जिसका राज्याभिषेक कलि संवत् ( युधिष्ठिर संवत् ) १३८५ ( अर्थात् १६५९ वर्ष विक्रम संवत् पूर्व, तथा १७१७ वर्ष ईस्वी सन् पूर्व) में हुआ था अपने अभिषेक से चौथे वर्ष में उसने गंगा के दक्षिण तट पर कुसुमपुर ( अर्थात् पाटलिपुत्र ) बसाया ! इसके विपरीत पालिबोधा के बसाये जाने का समय ईसा पूर्व ३०८२ वर्ष के लगभग होता है और उसके बसाने वाले का नाम हेराक्लीज लिखा है तथा पाटलिपुत्र के बसाये जाने का समय ईसवी पूर्व १७१५ है और उसका बसाने वाला शिशुनाग वंशीय आठवाँ राजा उदायी ( अथवा उदासी ) है । अतः पालिबोधा किसी भी तरह पाटलिपुत्र नहीं हो सकती और न तो सेण्ड्रा- कॉट्स चन्द्रगुप्त मौर्य ही हो सकता है । इसी प्रकार 'जैन पुस्तक परिशिष्ट' पटवन में भी पाटलिपुत्र को शिशुनाग वंशीय आठवें राजा द्वारा बसाये जाने का उल्लेख है । बृहत्संहिता में लिखा है— आसन् मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ । षड्द्विकपञ्चद्वियुतः शककालः तस्य राज्ञश्च ॥ ( अध्याय १३ श्लोक ३ ) अर्थात् महाराज युधिष्ठिर के शासन काल में सप्तर्षि मघा नक्षत्र में थे। महाराज युधिष्ठिर के सं० २५२६ वर्ष में शक प्रवृत्त हुआ है । इसके समर्थन में

भट्टोत्पल ने अपनी बृहत्संहिता की विवृत्ति में वृद्धगर्ग के निम्न वचन का उल्लेख है-- कलिद्वापरसन्धौ तु स्थितास्ते पितृदैवतम् । मुनयो धर्मनिरता........................ ॥ उपर्युक्त वाराही-संहिता में शक शब्द से सम्प्रति प्रचलित शालिवाहन शक नहीं समझना चाहिए । किन्तु शक का अर्थ है संवत् । कल्हण ने उसका अर्थ भ्रमवश शालिवाहन शक समझ लिया । अर्थात् २५२६ कलिगताब्द ( अथवा युधिष्ठिर गताब्द ) में शक का प्रारम्भ हुआ । उस संवत् में शक का प्रारम्भ समझकर कल्हण ने ६५३ वर्ष अधिक देखा और उतनी संख्या सभी संवतों में घटाकर प्रयोग किया । पाश्चात्य विद्वानों में विशेषकर जेनरल प्रिंसेप और जेनरल बर्किंघम ने सर विलियम के वक्तव्य को प्रमाणित मानकर जिन गुहाभिलेखों, स्तम्भाभिलेखों तथा शिलालेखों की खोज की है । उनमें चौदह प्रज्ञापनवाले लेख में अन्तियोक आदि पाँच नामों को यूनान के भिन्न-भिन्न भागों के राजाओं की कल्पना की है । उनको ईसवी संवत् पूर्व २५८, या प्रज्ञापनों का अंकित होना मानकर अभिलेखों के लिखाने वाले राजा को अशोक के समय का प्रतिपादित किया है । वस्तुतः अशोक के शिलालेख धर्म लेख नाम से प्रसिद्ध है देवानां प्रिय, प्रियदर्शी राजा तथा देवानां प्रिय अथवा प्रियदर्शी । बिना किसी व्यक्ति के नाम के द्वारा लिखाये गये जितने धर्मलेख अब तक गुहाओं, स्तम्भों तथा शिलाओं में पाये गये हैं वे धर्मलेख कब लिखे गये ? इसका उनमें कोई उल्लेख नहीं है । और न तो संवत् का ही उल्लेख मिलता है । एक में अशोक्स ये चार अक्षर मिलते हैं । शेष किसी भी लेख में अशोक का नाम नहीं है । इतना ही नहीं अभिलेखों में देवानां प्रियः, प्रियदर्शी राजा की द्विरुक्ति, त्रिरुक्ति तो की गई है, किन्तु अशोक इन तीन अक्षरों का उल्लेख नहीं है । अतः वे सब धर्मलेख अशोक वर्धन के माने जाने में कोई तर्क नहीं है । क्योंकि जिन विषयों का वर्णन सातवें स्तम्भाभिलेख के दूसरे तथा तेरहवें प्रज्ञापन में है ठीक उसी प्रकार का वर्णन चीनी

( २० ) यात्री ह्वेनसांग ने अपने भारत में हर्षवर्धन के राज्यकाल वर्णन के प्रसंग में किया है। पाश्चात्यों के मतानुसार यदि ये सभी धर्मलेख अशोक के मान लिए जाते हैं तो पौराणिक राजवंशावलियों के राजत्व कालों के आधार पर मौर्य अशोकवर्धन का राजत्व काल कलि संवत् १६५० विक्रम स० पूर्व १३९५ ई० पू० १४५२ से लगाकर कलि संवत् १६७६ वि० पू० १३६९ ई० पू० १४२६ तक २६ वर्ष होता है। ऐसी दशा में शिलालेख के प्रज्ञापनों में यूनान के उन पाँच राजाओं के नाम पढ़ना जिनके राजत्व काल ई० पू० २८५ से लेकर २३९ तक माने गये हैं सर्वथा भ्रान्ति ही है। पाश्चात्यों के विद्याव्यसन लगन एवं अनुसंधान परायणता प्रशंसनीय हैं, किन्तु जब हमारे वेद शास्त्र इतिहास की छानबीन करने बैठते हैं तब वे उलटे परिणाम पर पहुँचते हैं। लार्ड मैकाले ने लिखा है कि पाश्चात्य शिक्षा पाये हुए किसी हिन्दू को मूर्ति पूजन में विश्वास नहीं रह जायेगा। मैक्समूलर ने तो यहाँ तक कहा कि वेद मंत्र दकियानूसी और निरर्थक हैं। महाभारत एक व्यक्ति की कृति नहीं। अपनी पुस्तक 'चिप्स फ्राम दि जर्मन वर्कशाप' में वे और लिखते हैं कि वेद हिन्दू धर्म की चाभी हैं। उनके दृढ़ तथा दुर्बल स्थानों का ज्ञान ऐसे मिशनरियों के लिए अनिवार्य है जिन्हें ईसाई बनाने की उत्कट इच्छा है। ऐसे वाक्यों से उनके समस्त मनोभावों का पता लगता है। भारतीय ज्योतिर्विज्ञान और महाभारत पाश्चात्यों का यह भी मत है कि भारतीय ज्योतिर्विज्ञान महास्थूल गणना वेदांगज्योतिष की गणना से भी स्थूल थी। जिसके अनुसार भीष्म पितामह ने १३ वर्ष के सौर भान में तेरह वर्ष पाँच महीने बारह दिन की व्यवस्था विराट पर्व में दी थी। सिद्धान्त गणित का ज्ञान भारतीयों को यूनानी ज्योतिषियों से हुआ है तथा उन्हीं से नक्षत्र मंडल की १२ राशियों का विभाग करना भी सीखा। भारत में तो सूर्यादि सप्तवारों की भी जानकारी नहीं थी। वारों का ज्ञान काडिल्हा वालों से हुआ। अतएव जिन ग्रन्थों में बारह राशियों का विभाग, सूर्यादि वारों का नाम तथा ज्योतिष सिद्धान्त गणना का उल्लेख है वे

( २१ ) सभी ग्रन्थ ई० सन् पूर्व ४०० वर्ष से प्रथम के नहीं हो सकते जिन ग्रन्थों में चैत्रादि मासों का उल्लेख है वे भी वेदांग ज्योतिष एवं ब्राह्मण ग्रन्थों के बीच के माने जाने चाहिये । जिन ग्रन्थों में यवन जाति की विद्वत्ता, आक्रमण- कारिता, वीरता का उल्लेख है वे सभी ग्रन्थ सिकन्दर के आक्रमण ई० सन् पूर्व ३२३ के पीछे के हैं । ई० स० पूर्व पाँच सौ वर्ष के नहीं हैं । परन्तु उनकी उक्त कल्पना में भ्रान्ति या ईर्ष्या मूलकता ही है । ग्रीक देश के अर्थ में ई० सन् पूर्व कुछ शतियों से यूनान नाम की प्रसिद्धि हुई है । महाराज ययाति के पुत्र तुर्वसु एवं उनके पुत्र यवन राजाओं की प्रसिद्धि बहुत पुरानी है । महाभारत आदि पर्व ८५।३४ में कहा गया है-- 'यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः स्मृताः'--यदु से यादव हुए हैं और तुर्वसु से यवन । उनका राज्य यवन राज्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ । मनु ने मनु स्मृति १०।४३-४५ में बताया है कि पाण्ड्य, चोल, द्रविड़, कम्बोज, यवन, शक, पारद, पह्लव, दरद, खश आदि क्षत्रिय जातियां संस्कारों के लोप होने तथा ब्राह्मण सम्बन्धहीन होने से वृषल ( म्लेच्छ ) हो गयीं । इन्हीं राज्यों का वर्णन अशोक के प्रज्ञापन दो, पाँच और तेरह में आया है । उससे भी और प्राचीन ग्रन्थों में भी यूनान बनने के सहस्रों वर्ष पूर्व चन्द्रवंशी ययाति के पौत्र यवन के वंशधरों के अर्थ में ही यवन शब्द का उल्लेख हुआ है न कि यूनान के यूनानियों के अर्थ में । अतः महाभारतादि ग्रन्थों में यवनों के पराक्रम का वर्णन है । ज्योतिष विज्ञान सम्बन्धी पाश्चात्यों की धारणा भी गलत है । भारतीय ज्योतिर्विज्ञान सृष्टि से लेकर अन्त तक एक एवं निर्विकार है । विराट पर्व में राजर्षि भीष्म पितामह के तेरह वर्ष की प्रतिज्ञा के विषय में जो कहा गया है कि उस समय तक १३ वर्ष पाँच महीने बारह दिन द्यूतक्रीड़ा के दिन से बीत जायेंगे । इससे यही स्पष्ट है कि भारतीय युद्ध काल में भी हमारी वही सनातन काल गणना राष्ट्रमिति के रूप में मान्य थी । जिसके अनुसार श्री रामचन्द्र ने १४ वर्ष का वनवास पूर्ण किया । उसी के अनुसार पाण्डवों ने तेरह वर्ष की प्रतिज्ञा पूरी की थी । वह गणना है सौर चन्द्र जिसका वर्ष चैत्रशुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होकर चैत्र कृष्ण अमावस्या को पूरा होता है ।

उसमें वर्ष मान कम से कम ३५४ और अधिक से अधिक ३८४ दिन होते हैं। उसी वर्ष के अनुसार कौरवों के ठीक चौदहवें वर्ष के प्रथम दिन में वेदांग ज्योतिष के गणनानुसार १३ वर्ष पाँच महीने बारह दिन होते हैं। उदाहरणतः—यदि द्यूत क्रीड़ा की तिथि विक्रम संवत् १९९० जेष्ठ कृष्ण ८ बुधवार मान लिया जाय तो उस दिन राश्यादि सूर्य है १।३।३०।४१ और तारीख १७ मई सन् १९३३ ई० । अर्जुन के प्रकट होने की तिथि विक्रम संवत् २००३ ज्येष्ठ कृष्ण ८ शुक्रवार मानें तो उस दिन राश्यादि सूर्य हैं १।९।५२।९ ता० २४ मई सन् १९४६ ई० । ऐसी स्थिति में सौर चन्द्र मान से १३ वर्ष एक दिन होगा । अर्थात् १४वें वर्ष का पहला दिन, वही सौर मान से होगा १३ वर्ष ६ दिन, अंग्रेजी मान से होगा १३ वर्ष ७ दिन, चौदहवें वर्ष का सातवां दिन । वही वेदांग ज्योतिष के चन्द्र मान से होगा १३ वर्ष ५ महीने १२ दिन । यही भीष्म जी की व्यवस्था है । इससे स्पष्ट है कि महाभारत युद्ध काल में सिद्धान्त ज्योतिष के अनुसार ही पञ्चांग गणना होती थी । ऊपर का उदाहरण सिद्धान्त ज्योतिष गणना के पञ्चांग द्वारा ही किया गया है । सिद्धान्त ज्योतिष की गणना अहर्गण द्वारा मध्यम सूर्य चन्द्रादि ग्रहों में मन्दोच्च, शीघ्रोच्च संस्कार देकर ही की जाती है । अतएव भारतीय सनातन काल गणना सौर चान्द्र हैं। उसके लिए सूर्यादि वार का ज्ञान, चैत्रादि मास का ज्ञान और नक्षत्र मंडल के बारह विभाग का ज्ञान अत्यावश्यक है । बिना इसके सनातन काल गणना हो ही नहीं सकती । एको अश्वो वहति सप्तनामा (ऋ० सं० १।१६४।२) आदि अनेक मंत्रों में सात दिन का वर्णन है। मैत्रा- यणी उपनिषद् छठे प्रपाठक अंश १४ में ९ अंश वाली राशियों का वर्णन है। अन्नं वा अस्य सर्वस्य योनिः', कालश्चान्नस्य, सूर्यो योनिः कालस्य । तस्यैतद्रूपम् .........द्वादशात्मकं वत्सरम् एतस्याग्नेयमर्धमर्धं वारुणम् । मघाद्यं श्रविष्ठार्ध- माग्नेयम् क्रमेण, उत्क्रमेण सार्पार्धं श्रविष्ठार्धान्तं सौम्यम् तत्रैकैकमात्मनो नवांशकम्। इसमें बारह राशियों का एक वत्सर और प्रत्येक राशि नवांशक अर्थात् सवा दो नक्षत्र की कही गई है । श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण में भी राशियों का वर्णन है—

( २३ ) 'ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ ॥ ८ ॥ नक्षत्रे दिति दैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु । ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह ॥ ९ ॥ ( बा० का० १८ ) अर्थात् शुक्ल नवमी को अदिति दैवत पुनर्वसु नक्षत्र में ( जब स्वगृही होकर पाँच ग्रह उच्च के थे बृहस्पति और चन्द्रमा का योग था ) कर्क लग्न में राम का जन्म हुआ । वेदांग ज्योतिष याजुष ज्योतिष श्लोक ११ के मासपति के विचार में तथा आजकल के पञ्चांगों तक में सिद्धान्तगणित अविच्छिन्न रूप से देखा जा सकता है । इसी तरह चैत्रादि मासों के नामों का तथा अयन, विषुव, विष्णुपद एवं षडशीति नाम से सूर्य संक्रान्तियों का महाभारत संहिता में वर्णन है । ऋग्वेदादि के समान ही वार एवं संक्रान्तियाँ भी अनादि हैं । जब पूर्वोक्त रीति से महाभारत और गीता की इतनी प्राचीनता सिद्ध होती है तो उसमें वर्णित रामायण, रामायण के निर्माता महर्षि बाल्मीकि तथा रामायण के पात्रों की अति प्राचीनता सुतरां सिद्ध है ! पुराणों के सन्दर्भ में कहा जाता है कि पुराणों के अनुसार कृष्ण से लेकर चन्द्रगुप्त मौर्य तक १३८ राजाओं की पीढ़ियों का अनुमान लगाकर प्रत्येक का शासन २० वर्षों का माना जाय तो ३०८०, ई० पूर्व होता है । श्री गोपाल अय्यर ने महोपनन्द तक ३७, राज्यपीढ़ियों को मानते हुए प्रत्येक का शासन काल २२ वर्ष का मानकर महाभारत घटना को ११९३ ई० पूर्व निर्धारित किया है । पूर्वोक्त पद्धति के अनुसार यह स्पष्ट है कि १३८ पीढ़ी न होकर कुल ४० होती है । वस्तुतः जहाँ परीक्ष्य ग्रन्थ के आधार पर काल निर्धारण में कठिनाई हो वहीं पर ऐसे अनुमानों से काम चलाना पड़ता है । पीढ़ियों के आधार पर भी सही काल निर्धारण शक्य नहीं है । क्योंकि सभी घटनाएँ और सभी व्यक्ति ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं होते है । किन्तु जिन महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के द्वारा समाज या राष्ट्र को धार्मिक आध्यात्मिक और सामाजिक अभ्युत्थान के लिये

( २४ ) कुछ शिक्षा मिलती हो उन्हों घटनाओं और व्यक्तियों का इतिहास में उल्लेख होता है । अन्यथा जिनका ऐतिहासिक एवं प्रागैतिहासिक काल ६ हजार वर्ष में ही समाप्त हो जाता है उनके अनुसार भी यदि संसार के एक वर्ष के इतिहास को एक पन्ने में ही लिखा जाय तो भी ६ हजार पन्ने का इतिहास . होगा । फिर जिन भारतीयों की वर्तमान सृष्टि का कुछ कम दो अरब वर्ष का इतिहास है। उनका इतिहास दो अरब पन्नों का होगा फिर उसे कौन कितने दिन में अध्ययन करेगा और उतने बड़े इतिहास का निष्कर्ष कितने दिन में अध्ययन करेगा और उतने बड़े इतिहास का निष्कर्ष कितने दिन में निकालकर कब उससे सबक सीखकर उससे फायदा उठायेगा । अतः सर्वज्ञकल्प महर्षियों ने टेलीप्रिंटर के समाचारों, संवाददाताओं के तारों के आधार पर नहीं, आँखों देखे के आधार पर भी नहीं, किन्तु योगजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा के आधार पर समाज एवं राष्ट्र के धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक उत्थान के उपयोगी ज्ञानप्रद इतिहास का उल्लेख किया है । अन्यथा गड़े मुर्दों को बार-बार उखाड़ने जैसी पुरानी बातों को बार-बार दोहराना मात्र इतिहास का मुख्य विषय हो ही नहीं सकता है । अतएव सर्वज्ञकल्प महर्षियों ने अनादि, अपौरुषेय वेदादि शास्त्रों से अनुप्राणित राम और युधिष्ठिर जैसे विशिष्ट अवतारी पुरुषों एवं उनसे सम्बन्धित व्यक्तियों एवं घटनाओं का. प्रामाणिक उल्लेख किया है । रामायण महाभारत तथा पुराणों के राजाओं की सूची में भी मुख्य-मुख्य उल्लेख्य राजाओं का उल्लेख हुआ है, सबका नहीं । उनमें भी कुछ लोगों की आयु बहुत अधिक थी । रामायण के अनुसार श्री रामचन्द्र जी ने ११०००, वर्ष तक राज्य किया । दशरथ जी का उससे भी अधिक काल तक राज्य करने का ,उल्लेख है । उनमें कई राजा कृतयुग के, कई त्रेता के थे । युधिष्ठिर द्वापरान्त के राजा थे । मानवीय वर्ष के अनुसार कलि की आयु ४३२००० की है । उससे दुगुनी द्वापर, तिगुनी त्रेता तथा चौगुनी कृत युग की आयु है । चौदह मन्वन्तरों में वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर का यह अठाइसवाँ कलियुग है । श्रीराम का प्रादुर्भाव २४ वें त्रेता का है ।

( २५ ) चतुर्विंशे युगे चापि विश्वामित्रपुरःसरः । राज्ञो दशरथस्याथ पुत्रः पद्मायतेक्षणः ॥' ( हरिवंश १।४१।१२१ ) ‘चतुर्विंशे युगे वत्स त्रेतायां रघुवंशजः । रामो नाम भविष्यामि चतुर्व्यूहः सनातनः ॥’ ( ब्रह्माण्ड पुराण उपोद्घातपाद अ० ३७ श्लो० ३० ) वैवस्वत मनु को हुए अब तक बारह करोड़ पांच लाख तैंतीस हजार वर्ष से भी अधिक हुए। वर्तमान सृष्टि को हुए अब तक १ अरब ९५ करोड़ ५८ लाख २५ हजार से अधिक हुआ। ब्रह्मा के एक दिन में १४ मनु बीतते हैं जिसमें ४ अरब ३२ करोड़ वर्ष होते हैं। १५ खरब, ५५ अरब २० करोड़ मानव वर्ष का उनका एक वर्ष होता है। अब तक ब्रह्मा के ५० वर्ष बीत गये हैं। जिसमें ७ नील ७७ खरब, ६० अरब वर्ष बीत गये हैं। इस महान् काल में रामायण, महाभारत तथा पुराणों में वर्णित पीढ़ियां बहुत ही कम ठहरती हैं। अतः व्यासदेव ने उनमें से मुख्य-मुख्य राजाओं का वर्णन किया है। उसी वंश में होने वाले पूर्व-पूर्व मुख्य पुरुषों के पुत्रादि रूप में उत्तरोत्तर मुख्य पुरुषों का वर्णन किया है। लिंग पुराण में कहा है—‘एते ह्येते इक्ष्वाकुदायादा राजानः प्रायशः स्मृताः । वंशे प्रधानां एतस्मिन् प्राधान्येन प्रकीर्तिताः ॥’ ( लिङ्ग पुराण पूर्वार्ध ६६।३३ ) पुरातत्त्व रामायण-महाभारत पुरातत्त्व के आधार पर भी काल निर्धारण आंशिक रूप से ही हो सकते हैं जिसे भूरे चित्रित पात्र स्तर की उपलब्ध सामग्रियों से महाभारत कालीन सभ्यता से सम्बन्धित किया गया है, उनसे महाभारत की विकसित सभ्यता से मेल नहीं खाता। महाभारत में वर्णित अस्त्र-शस्त्र पूर्ण विकसित सुसज्जित प्रणाली के द्योतक हैं। उत्खनन में प्राप्तसामग्रियां महाभारत में वर्णित सामग्रियों से मेल नहीं खातीं। अतएव वे सब महाभारत कालीन नहीं है। कुछ लोगों का मत है कि महाभारत में वर्णित लोह अस्त्र-शस्त्र का आवि- र्भाव ईसाके कुछ शताब्दी पूर्व हुआ तो महाभारत की घटना ईसा से हजारों

( २६ ) वर्ष पूर्व कैसे सम्भव है ? यह कथन वैसे ही है जैसे वायुयान का विकास तो १९ शती में हुआ फिर रामायण में पुष्पक विमान का वर्णन कैसे हो सकता है ? वस्तुतः सृष्टि में अनेक बार ऐसे ह्रास-विकास होते रहते हैं जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता । विगत ५३ वर्ष पहिले जोन० टी० रीड को नेवादा में एक पद- चिह्न और एक जूते का तल्ला मिला । उन्होंने अपने चट्टान विषयक भूगर्भ सम्बन्धी ज्ञान से उसे ५० लाख वर्ष पुराना बतलाया । जाहिर है कि उस समय मनुष्य सूई से सिल कर जूता पहनता था तो लौह का प्रादुर्भाव तो उससे कितने पहले हुआं होगा । अगस्त १९२३ में थियोसोफिकल पाथ में हैनसन ने लिखा है कि उस तल्ले में सूई सिलाई, धागों में मरोड़, धागों के माप मिलते हैं जो आजकल के अच्छे से अच्छे बने जूतों के समान हलके और सूक्ष्म हैं। इससे सिद्ध होता है कि ५० लाख वर्ष से मनुष्य जूता पहनता है और वह सूई, सूत, सिलाई, नपाई का ज्ञान प्राप्त कर चुका था । कभी-कभी जङ्गली युग एवं सभ्यता युग की विरुद्ध वस्तुएँ एक स्थान में मिल जाती हैं । मूहनजोदड़ो और हड़प्पा के खण्डहरों में जहाँ सभ्यता के चिह्न मिलते हैं वहीं पत्थर के शस्त्र जङ्गलीपन के चिह्न मिलते हैं । रामायण हरिवंश एवं ब्रह्माण्डपुराण में चौबीसवें त्रेता में रामावतार लिखा हुआ है । बाल्मीकीय रामायण का माहात्म्य और उसके रचयिता का वर्णन महाभारत में मिलता है । राम, सीता तथा दशरथ के भी नाम का उल्लेख वेदों में है । बाल्मीकि ने ब्रह्मा के आदेश पर समाधि द्वारा ऋतम्भरा प्रज्ञा प्राप्त कर राम, सीता, लक्ष्मण, भरत-शत्रुघ्न, दशरथ और कौशल्यादि की गुप्त-प्रकट सभी घटनाओं का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करके वर्णन किया है । बाल्मीकि ने समुद्र नहीं देखा था यह वही कह सकता है जिसने बाल्मीकि का समुद्र वर्णन नहीं पढ़ा । उसके द्वारा ही किसी झील में पुल बाँधने को सेतुबन्ध और मध्य प्रदेश में लंका बतलाया जा सकता है । इसी तरह रत्न जटिल पादुका ओर स्वर्ण मुद्रिका को प्रक्षिप्त कह सकता है ।

( २७ ) राम की अँगूठी सांकलिया आदि कुछ सज्जन यह भी कहते हैं कि भगवान् श्रीराम ने मुनि का वेष धारण करके जब राज्य की कोई सम्पत्ति न लेकर वन की यात्रा की तब फिर उनके पास अंगूठी कहाँ से आई ? और स्वर्णभूषित रत्नजटित पादुका कहाँ से आई ? अंगूठी तो भगवान् श्रीराम ने हनुमान् को सीतान्वेषण के लिए प्रस्थान के समय और रत्नजटित स्वर्णभूषित पादुका भरत को चित्रकूट से अयोध्या वापस आते समय दी थी । अतः इन अंशों को प्रक्षिप्त मानना चाहिए । दूसरी बात यह है कि धातुद्रावण ( धातुओं के गलाने ) का ज्ञान लोगों को बाद में हुआ । पहले तो लोग पत्थरों और हड्डियों के औजारों से लड़ते थे । लोहे का तीर बहुत बाद में बना । फिर उन पर नामोटंकन तो ईसा सन् के आस-पास ही लोगों ने जाना । अतः बाल्मीकीय रामायण में रामनामांकित अंगुलीय का वर्णन और रत्नजटित स्वर्णभूषित पादुका का वर्णन पीछे मिलाया गया है । परन्तु वैसी शंका निर्मूल ही है, क्योंकि दण्डकारण्य प्रस्थान के समय माता कौशल्या के पास जब उनकी अनुज्ञा प्राप्त करने भगवान् श्रीराम गये, तब माता ने राजकुमारों के योग्य आसन दिया । उस पर न बैठ कर केवल उसका स्पर्श करके कहा कि—मुझे दण्डकारण्य जाना है । इस आसन से अब क्या मतलब ? मेरे लिए तो विष्टर आसन इस समय चाहिए । चौदह वर्ष निर्जन वन में मुनियों के समान ( मसाला आदि डालकर बनाया हुआ मांस नहीं ) कन्दमूल फल से जीवनयात्रा चलाते हुए रहना है । 'गमिष्ये दण्डकारण्यं किमनेनासनेन मे । विष्टरासनयोग्यो हि कालोऽयं मामुपस्थितः ॥ २८ ॥ चतुर्दश हि वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने । कन्दमूलफलैर्जीवन् हित्वा मुनिवदामिषम् ॥ २९ ॥ ( अयो० का० २० ) यहाँ प्रश्न उठता है कि वे वन में गृहस्थाश्रम में गये हैं अथवा वानप्रस्थ आश्रम में ? उत्तर स्पष्ट है—अयोध्या में गृहस्थाश्रम में हैं । वहाँ से उनका निर्वासन हो रहा है । आश्रमान्तर प्राप्ति की कोई बात नहीं। गृहस्थ ही रहकर

( २८ ) वे वनवास में गये हैं। राज्य की सम्पत्ति उन्होंने छुई नहीं। फिर भी भगवान् श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा है कि—महाराज जनक के यज्ञ में महात्मा वरुण ने रौद्रदर्शन (देखने से ही हृदय कँपा देने वाले) दो धनुष, दो दिव्य अभेद्य कवच तथा सदा बाणों से भरे रहने वाले दो तरकस और सूर्य के समान चमकीले दो हेम (स्वर्ण) परिष्कृत तलवार ये सब हमको दहेज में दिये थे। आचार्य के घर से उन्हें लेकर तुम शीघ्र आओ। 'ये च राज्ञे ददौ दिव्ये महात्मा वरुणः स्वयम् । जनकस्य महायज्ञे धनुषी रौद्रदर्शने ॥ २९ ॥ अभेद्ये कवचे दिव्ये तूणीचाक्षयसायकौ । आदित्यविमलाभौ द्वौ खड्गौ हेमपरिष्कृतौ ॥ ३० ॥' (अयो० का० ३१) जिस धनुष को भगवान् राम ने तोड़ा वह धनुष भी वरुण ने महाराज जनक के पूर्वजों को दिया था। उसकी चर्चा जगदम्बा सीता ने माता अनसूया के सामने तथा महाराज जनक ने ब्रह्मर्षि विश्वामित्र और राम, लक्ष्मण के समक्ष किया है। दण्डकारण्य में महर्षि अगस्त्य ने स्वर्ण और हीरा जटित विश्वकर्मा द्वारा निर्मित विष्णुदैवत दिव्य धनुष, ब्रह्मा जी द्वारा प्रदत्त अमोघ सूर्य के समान तेजस्वी दिव्य बाण और इन्द्र द्वारा दिये हुये जाज्वल्यमान बाणों से सदा भरे रहने वाले दो तूणीर तथा सुवर्ण की म्यान और मुट्ठी वाली तलवार भी दी है। 'इदं दिव्यं महच्चापं हेमवज्रविभूषितम् । वैष्णवं पुरुषव्याघ्र निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ ३२ ॥ अमोघः सूर्यसंकाशो ब्रह्मदत्तः शरोत्तमः । दत्तौ मम महेन्द्रेण तूणी चाक्षयसायकौ ॥ ३३ ॥ सम्पूर्णौ निशितैर्बाणैर्ज्वलद्भिरिव पावकैः । 'महारजतकोशोऽयमसिर्हेमविभूषितः ॥ ३४ ॥ (अरण्यकाण्ड १२)

( २९ ) अर्थात् राजकुमार की स्वयं व्यक्तिगत सम्पत्ति बहुत थी । भगवान् श्री राम वह भी चाहते तो ले जा सकते थे क्योंकि वह राज्य की नहीं थी । जब उन्होंने दान किया तो उसे ले जाने में कोई बाधा नहीं थी । उनके मामा के यहाँ से जो शत्रुञ्जय नामक हाथी उन्हें मिला था उसका दान उन्होंने वसिष्ठ जी के पुत्र सुयज्ञ को एक हजार निष्क ( स्वर्णमुद्रा ) दक्षिणा के साथ दे दिया । ब्राह्मणों में सर्वश्रेष्ठ अगस्त्य और विश्वामित्र को बुला कर उनका पूजन कर दान के लिये ऐसे रत्नों की वर्षा की जैसे खेत में मेघ जल की वर्षा करता है । वाल्मीकिरामायण में बहुत प्रकार से दान का वर्णन किया गया है । भगवान् राम अपनी अपने नाम वाली अँगूठी अपने साथ ले गये थे । इन्द्र के हाथ में जैसे वज्र है, विष्णु के हाथ में चक्र है, और भगवान् त्रिनेत्र- धारी शङ्कर के हाथ में त्रिशूल है, वैसे ही द्विज के हाथ में पवित्री है । 'यथा वज्रं सुरेन्द्रस्य यथा चक्रं हरेस्तथा । त्रिशूलं च त्रिनेत्रस्य तथा विप्रपवित्रकम् ॥' यह पवित्री सुवर्ण की बहुत पवित्र मानी गयी है । 'अन्यान्यपि पवित्राणि कुशदूर्वामयानि च । हेमालयपवित्रस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥' यह वचन हेमाद्रि से उद्धृत है । अर्थात् कुश दूर्वा की अन्य पवित्रियाँ सुवर्ण पवित्री ( अंगूठी ) की सोलहवीं कला ( पसँहा ) के बराबर भी नहीं होतीं । यह सुवर्ण पवित्री अनामिका के मूल में पहिननी चाहिये । अत्रि का वचन है— 'अनामिकामूलदेशे पवित्रं धारयेद् द्विजः ।' गुरु द्रोण के हाथ में भी यही पावित्री थी जिसे सूखे कुएँ में डालकर उन्होंने गुल्ली के साथ निकाल कर कौरव, पाण्डवों को चकित कर दिया था । रही पादुका की बात उसे तो भरत जी अपने साथ अभिषेक सामग्री के साथ ले गये थे उसी में वह गयी थी । जब भगवान् श्री राम ने वन से राज्य के लिये अयोध्या लौटना कथमपि स्वीकार नहीं किया तब भरत जी के मन

( ३० ) में वह आशंका घर कर गयी जिसकी सम्भावना कौसल्या ने का थी । जैसे सिंह कभी दूसरे द्वारा आनीत मांस खाना नहीं चाहता इसी प्रकार परभुक्त राज्य को राम स्वीकार नहीं करेंगे । ‘न· पुरेणाहृतं भक्ष्यं व्याघ्रः खादितुगच्छति । एवमेव नरव्याघ्रः परलीढं न मन्यते ॥’ ( अयो० ६१ ) अतः भरत जी ने स्वर्णभूषित पादुका श्री राम के सम्मुख रखकर कहा— “हे भगवान् ! आप अपने चरणों को इन दोनों पादुकाओं पर रख दीजिये, ये ही राजसिंहासनस्थ होकर सम्पूर्ण जनों का योग-क्षेम निर्वाह करेंगी ।” ‘अधिरोहार्य पादाभ्यां पादुके हेमभूषिते । एते हि सर्वलोकस्य योगक्षेमं विधास्यतः ॥’ ( अयो० ११२ ) भरत जी ने राज्य को भगवान् श्री राम का धरोहर माना । ‘भरतः शिरसा कृत्वा सन्यासं पादुके ततः ॥ १५ ॥ ( अयो० ११५ ) यदि भगवान् रामचन्द्र के पास स्वर्णभूषित पादुका होती तो भरत जी उनसे यह नहीं कहते कि इस पर ‘अधिरोह’ चढ़ चाइये । ऐतरेय ब्राह्मण में सौवर्ण पलङ्ग का वर्णन है, जिस पर बैठ कर होता सम्राट् की स्तुति करता है । सुवर्ण द्रावण का ज्ञान यदि उस समय न होता तो सुवर्ण का तार या शय्या कैसे बनती ? इसी प्रकार नामांकन की बात है। मुद्राराक्षस नाटक का आधार ही राक्षस के नाम वाली मुद्रा ( अंगूठी ) है । अभिज्ञान शाकुन्तल में महाकवि कालिदास ने भी दुष्यन्त के नाम वाली अंगूठी को ही प्रत्यभिज्ञा ( पहचान का साधन ) बताया है । भगवान् श्री राम ने हनुमान् जी को अपने नाम से अंकित अँगूठी जगज्जननी सीता के पहचान के लिये दी ।

( २२ ) 'ददौ तस्य ततः प्रीतः स्वनामाङ्कोशोभितम् । अंगुलीयमभिज्ञानं राजपुत्र्याः परन्तपः ॥ १२ ॥' ( किष्किन्धा० ४४ ) हनुमान् जी ने जगज्जननी सीता से कहा कि 'हे देवि ! मैं रामदूत बानर हूँ। देखो राम नाम से अंकित यह अंगूठी मैं लाया हूँ ।'' 'वानरोऽहं महाभागे दूतो रामस्य धीमतः । रामनामाङ्कितं चेदं पश्य देव्यंगुलीयकम् ॥ २ ॥' ( सुन्दर० ३६ ) भरत जी को भी हनुमान् जी ने सुनाया कि मैंने रामनाम वाली अँगूठी सीता के अभिज्ञान के लिये दी है । अभिज्ञानं मया दत्तं रामनामांगुलीयकम् ॥ ४५ ॥' ( युद्ध काण्ड १२६ ) इसी तरह भगवान् राम के नामों वाले बाणों की चर्चा भी रामायण में है। इसी प्रकार सीता रावण के वश में कैसे हो इसका विचार करते हुए महोदर ने रावण से कहा कि आप सीता को प्राप्त करके उसके भोग में क्यों विलम्ब कर रहे हैं ? आप जब चाहें तब सीता वश में हो सकती है। मैंने कुछ उपाय सोचा है यदि आप को जँचे तो उसके अनुसार आप कार्य करें । हम द्विजिह्व संह्लादी कुम्भकर्ण और वितर्दन ये पाँच महावीर राम का वध करने जा रहे हैं, इसकी घोषणा करा दीजिये । हम लोग युद्ध में जाकर यदि शत्रु विजय कर लेते हैं तो दूसरे उपाय की आवश्यकता नहीं । यदि शत्रु मरा नहीं और हम लोग युद्ध में बचे रहे तो युद्ध से वापस आ जायेंगे । हम लोगों का शरीर रामनामांकित बाणों से क्षत-विक्षत होगा, रुधिर शरीर से निकल रहा होगा । हम लोग मिथ्या ही कहेंगे कि हम लोगों ने राम और लक्ष्मण को खा लिया है और आप के चरणों में प्रणाम करेंगे । आप बनावटी प्रसन्नता दिखाते हुये हम लोगों की इच्छा के अनुसार इनाम दें। ऐकान्त में सीता के