काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २० ) यात्री ह्वेनसांग ने अपने भारत में हर्षवर्धन के राज्यकाल वर्णन के प्रसंग में किया है। पाश्चात्यों के मतानुसार यदि ये सभी धर्मलेख अशोक के मान लिए जाते हैं तो पौराणिक राजवंशावलियों के राजत्व कालों के आधार पर मौर्य अशोकवर्धन का राजत्व काल कलि संवत् १६५० विक्रम स० पूर्व १३९५ ई० पू० १४५२ से लगाकर कलि संवत् १६७६ वि० पू० १३६९ ई० पू० १४२६ तक २६ वर्ष होता है। ऐसी दशा में शिलालेख के प्रज्ञापनों में यूनान के उन पाँच राजाओं के नाम पढ़ना जिनके राजत्व काल ई० पू० २८५ से लेकर २३९ तक माने गये हैं सर्वथा भ्रान्ति ही है। पाश्चात्यों के विद्याव्यसन लगन एवं अनुसंधान परायणता प्रशंसनीय हैं, किन्तु जब हमारे वेद शास्त्र इतिहास की छानबीन करने बैठते हैं तब वे उलटे परिणाम पर पहुँचते हैं। लार्ड मैकाले ने लिखा है कि पाश्चात्य शिक्षा पाये हुए किसी हिन्दू को मूर्ति पूजन में विश्वास नहीं रह जायेगा। मैक्समूलर ने तो यहाँ तक कहा कि वेद मंत्र दकियानूसी और निरर्थक हैं। महाभारत एक व्यक्ति की कृति नहीं। अपनी पुस्तक 'चिप्स फ्राम दि जर्मन वर्कशाप' में वे और लिखते हैं कि वेद हिन्दू धर्म की चाभी हैं। उनके दृढ़ तथा दुर्बल स्थानों का ज्ञान ऐसे मिशनरियों के लिए अनिवार्य है जिन्हें ईसाई बनाने की उत्कट इच्छा है। ऐसे वाक्यों से उनके समस्त मनोभावों का पता लगता है। भारतीय ज्योतिर्विज्ञान और महाभारत पाश्चात्यों का यह भी मत है कि भारतीय ज्योतिर्विज्ञान महास्थूल गणना वेदांगज्योतिष की गणना से भी स्थूल थी। जिसके अनुसार भीष्म पितामह ने १३ वर्ष के सौर भान में तेरह वर्ष पाँच महीने बारह दिन की व्यवस्था विराट पर्व में दी थी। सिद्धान्त गणित का ज्ञान भारतीयों को यूनानी ज्योतिषियों से हुआ है तथा उन्हीं से नक्षत्र मंडल की १२ राशियों का विभाग करना भी सीखा। भारत में तो सूर्यादि सप्तवारों की भी जानकारी नहीं थी। वारों का ज्ञान काडिल्हा वालों से हुआ। अतएव जिन ग्रन्थों में बारह राशियों का विभाग, सूर्यादि वारों का नाम तथा ज्योतिष सिद्धान्त गणना का उल्लेख है वे