काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभट्टोत्पल ने अपनी बृहत्संहिता की विवृत्ति में वृद्धगर्ग के निम्न वचन का उल्लेख है-- कलिद्वापरसन्धौ तु स्थितास्ते पितृदैवतम् । मुनयो धर्मनिरता........................ ॥ उपर्युक्त वाराही-संहिता में शक शब्द से सम्प्रति प्रचलित शालिवाहन शक नहीं समझना चाहिए । किन्तु शक का अर्थ है संवत् । कल्हण ने उसका अर्थ भ्रमवश शालिवाहन शक समझ लिया । अर्थात् २५२६ कलिगताब्द ( अथवा युधिष्ठिर गताब्द ) में शक का प्रारम्भ हुआ । उस संवत् में शक का प्रारम्भ समझकर कल्हण ने ६५३ वर्ष अधिक देखा और उतनी संख्या सभी संवतों में घटाकर प्रयोग किया । पाश्चात्य विद्वानों में विशेषकर जेनरल प्रिंसेप और जेनरल बर्किंघम ने सर विलियम के वक्तव्य को प्रमाणित मानकर जिन गुहाभिलेखों, स्तम्भाभिलेखों तथा शिलालेखों की खोज की है । उनमें चौदह प्रज्ञापनवाले लेख में अन्तियोक आदि पाँच नामों को यूनान के भिन्न-भिन्न भागों के राजाओं की कल्पना की है । उनको ईसवी संवत् पूर्व २५८, या प्रज्ञापनों का अंकित होना मानकर अभिलेखों के लिखाने वाले राजा को अशोक के समय का प्रतिपादित किया है । वस्तुतः अशोक के शिलालेख धर्म लेख नाम से प्रसिद्ध है देवानां प्रिय, प्रियदर्शी राजा तथा देवानां प्रिय अथवा प्रियदर्शी । बिना किसी व्यक्ति के नाम के द्वारा लिखाये गये जितने धर्मलेख अब तक गुहाओं, स्तम्भों तथा शिलाओं में पाये गये हैं वे धर्मलेख कब लिखे गये ? इसका उनमें कोई उल्लेख नहीं है । और न तो संवत् का ही उल्लेख मिलता है । एक में अशोक्स ये चार अक्षर मिलते हैं । शेष किसी भी लेख में अशोक का नाम नहीं है । इतना ही नहीं अभिलेखों में देवानां प्रियः, प्रियदर्शी राजा की द्विरुक्ति, त्रिरुक्ति तो की गई है, किन्तु अशोक इन तीन अक्षरों का उल्लेख नहीं है । अतः वे सब धर्मलेख अशोक वर्धन के माने जाने में कोई तर्क नहीं है । क्योंकि जिन विषयों का वर्णन सातवें स्तम्भाभिलेख के दूसरे तथा तेरहवें प्रज्ञापन में है ठीक उसी प्रकार का वर्णन चीनी