भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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( १८ ) होता है कि गंगा, यमुना के संगम से २०० मील ऊपर की ओर पालिबोधा बसी थी । सर विलियम जोंस के वक्तव्य के अनुसार आरायन के मत से गंगा और ईरानावोअस का संगम प्रसई ( प्रस्सी ) जनपद में था । कर्टियस का मत है कि मेगस्थनीज का पालिबोधा प्रमद्रक ( या पारिभद्रक ) जनपद है । उपर्युक्त विवरण से यह सिद्ध होता है कि गंगा यमुना के संगम से ऊपर २०० मील पर पालिबोधा नगरी सेण्ड्राकांटस से लगभग २८ सौ वर्ष पहले बसाई गई थी । आधुनिक विद्वानों के अनुसार प्रतिपीढ़ी २० वर्ष मानने पर १३८ पीढ़ी में २७६० वर्ष होते हैं । वर्तमान में पाटलिपुत्र प्रयाग से लगभग ढाई सौ मील नीचे की ओर है । पुराणों के अनुसार शिशुनाग वंश के आठवें राजा उदायी (अथवा उदासी) ने जिसका राज्याभिषेक कलि संवत् ( युधिष्ठिर संवत् ) १३८५ ( अर्थात् १६५९ वर्ष विक्रम संवत् पूर्व, तथा १७१७ वर्ष ईस्वी सन् पूर्व) में हुआ था अपने अभिषेक से चौथे वर्ष में उसने गंगा के दक्षिण तट पर कुसुमपुर ( अर्थात् पाटलिपुत्र ) बसाया ! इसके विपरीत पालिबोधा के बसाये जाने का समय ईसा पूर्व ३०८२ वर्ष के लगभग होता है और उसके बसाने वाले का नाम हेराक्लीज लिखा है तथा पाटलिपुत्र के बसाये जाने का समय ईसवी पूर्व १७१५ है और उसका बसाने वाला शिशुनाग वंशीय आठवाँ राजा उदायी ( अथवा उदासी ) है । अतः पालिबोधा किसी भी तरह पाटलिपुत्र नहीं हो सकती और न तो सेण्ड्रा- कॉट्स चन्द्रगुप्त मौर्य ही हो सकता है । इसी प्रकार 'जैन पुस्तक परिशिष्ट' पटवन में भी पाटलिपुत्र को शिशुनाग वंशीय आठवें राजा द्वारा बसाये जाने का उल्लेख है । बृहत्संहिता में लिखा है— आसन् मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ । षड्द्विकपञ्चद्वियुतः शककालः तस्य राज्ञश्च ॥ ( अध्याय १३ श्लोक ३ ) अर्थात् महाराज युधिष्ठिर के शासन काल में सप्तर्षि मघा नक्षत्र में थे। महाराज युधिष्ठिर के सं० २५२६ वर्ष में शक प्रवृत्त हुआ है । इसके समर्थन में