भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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उसमें वर्ष मान कम से कम ३५४ और अधिक से अधिक ३८४ दिन होते हैं। उसी वर्ष के अनुसार कौरवों के ठीक चौदहवें वर्ष के प्रथम दिन में वेदांग ज्योतिष के गणनानुसार १३ वर्ष पाँच महीने बारह दिन होते हैं। उदाहरणतः—यदि द्यूत क्रीड़ा की तिथि विक्रम संवत् १९९० जेष्ठ कृष्ण ८ बुधवार मान लिया जाय तो उस दिन राश्यादि सूर्य है १।३।३०।४१ और तारीख १७ मई सन् १९३३ ई० । अर्जुन के प्रकट होने की तिथि विक्रम संवत् २००३ ज्येष्ठ कृष्ण ८ शुक्रवार मानें तो उस दिन राश्यादि सूर्य हैं १।९।५२।९ ता० २४ मई सन् १९४६ ई० । ऐसी स्थिति में सौर चन्द्र मान से १३ वर्ष एक दिन होगा । अर्थात् १४वें वर्ष का पहला दिन, वही सौर मान से होगा १३ वर्ष ६ दिन, अंग्रेजी मान से होगा १३ वर्ष ७ दिन, चौदहवें वर्ष का सातवां दिन । वही वेदांग ज्योतिष के चन्द्र मान से होगा १३ वर्ष ५ महीने १२ दिन । यही भीष्म जी की व्यवस्था है । इससे स्पष्ट है कि महाभारत युद्ध काल में सिद्धान्त ज्योतिष के अनुसार ही पञ्चांग गणना होती थी । ऊपर का उदाहरण सिद्धान्त ज्योतिष गणना के पञ्चांग द्वारा ही किया गया है । सिद्धान्त ज्योतिष की गणना अहर्गण द्वारा मध्यम सूर्य चन्द्रादि ग्रहों में मन्दोच्च, शीघ्रोच्च संस्कार देकर ही की जाती है । अतएव भारतीय सनातन काल गणना सौर चान्द्र हैं। उसके लिए सूर्यादि वार का ज्ञान, चैत्रादि मास का ज्ञान और नक्षत्र मंडल के बारह विभाग का ज्ञान अत्यावश्यक है । बिना इसके सनातन काल गणना हो ही नहीं सकती । एको अश्वो वहति सप्तनामा (ऋ० सं० १।१६४।२) आदि अनेक मंत्रों में सात दिन का वर्णन है। मैत्रा- यणी उपनिषद् छठे प्रपाठक अंश १४ में ९ अंश वाली राशियों का वर्णन है। अन्नं वा अस्य सर्वस्य योनिः', कालश्चान्नस्य, सूर्यो योनिः कालस्य । तस्यैतद्रूपम् .........द्वादशात्मकं वत्सरम् एतस्याग्नेयमर्धमर्धं वारुणम् । मघाद्यं श्रविष्ठार्ध- माग्नेयम् क्रमेण, उत्क्रमेण सार्पार्धं श्रविष्ठार्धान्तं सौम्यम् तत्रैकैकमात्मनो नवांशकम्। इसमें बारह राशियों का एक वत्सर और प्रत्येक राशि नवांशक अर्थात् सवा दो नक्षत्र की कही गई है । श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण में भी राशियों का वर्णन है—