भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( २३ ) 'ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ ॥ ८ ॥ नक्षत्रे दिति दैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु । ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह ॥ ९ ॥ ( बा० का० १८ ) अर्थात् शुक्ल नवमी को अदिति दैवत पुनर्वसु नक्षत्र में ( जब स्वगृही होकर पाँच ग्रह उच्च के थे बृहस्पति और चन्द्रमा का योग था ) कर्क लग्न में राम का जन्म हुआ । वेदांग ज्योतिष याजुष ज्योतिष श्लोक ११ के मासपति के विचार में तथा आजकल के पञ्चांगों तक में सिद्धान्तगणित अविच्छिन्न रूप से देखा जा सकता है । इसी तरह चैत्रादि मासों के नामों का तथा अयन, विषुव, विष्णुपद एवं षडशीति नाम से सूर्य संक्रान्तियों का महाभारत संहिता में वर्णन है । ऋग्वेदादि के समान ही वार एवं संक्रान्तियाँ भी अनादि हैं । जब पूर्वोक्त रीति से महाभारत और गीता की इतनी प्राचीनता सिद्ध होती है तो उसमें वर्णित रामायण, रामायण के निर्माता महर्षि बाल्मीकि तथा रामायण के पात्रों की अति प्राचीनता सुतरां सिद्ध है ! पुराणों के सन्दर्भ में कहा जाता है कि पुराणों के अनुसार कृष्ण से लेकर चन्द्रगुप्त मौर्य तक १३८ राजाओं की पीढ़ियों का अनुमान लगाकर प्रत्येक का शासन २० वर्षों का माना जाय तो ३०८०, ई० पूर्व होता है । श्री गोपाल अय्यर ने महोपनन्द तक ३७, राज्यपीढ़ियों को मानते हुए प्रत्येक का शासन काल २२ वर्ष का मानकर महाभारत घटना को ११९३ ई० पूर्व निर्धारित किया है । पूर्वोक्त पद्धति के अनुसार यह स्पष्ट है कि १३८ पीढ़ी न होकर कुल ४० होती है । वस्तुतः जहाँ परीक्ष्य ग्रन्थ के आधार पर काल निर्धारण में कठिनाई हो वहीं पर ऐसे अनुमानों से काम चलाना पड़ता है । पीढ़ियों के आधार पर भी सही काल निर्धारण शक्य नहीं है । क्योंकि सभी घटनाएँ और सभी व्यक्ति ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं होते है । किन्तु जिन महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के द्वारा समाज या राष्ट्र को धार्मिक आध्यात्मिक और सामाजिक अभ्युत्थान के लिये