भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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( २७ ) राम की अँगूठी सांकलिया आदि कुछ सज्जन यह भी कहते हैं कि भगवान् श्रीराम ने मुनि का वेष धारण करके जब राज्य की कोई सम्पत्ति न लेकर वन की यात्रा की तब फिर उनके पास अंगूठी कहाँ से आई ? और स्वर्णभूषित रत्नजटित पादुका कहाँ से आई ? अंगूठी तो भगवान् श्रीराम ने हनुमान् को सीतान्वेषण के लिए प्रस्थान के समय और रत्नजटित स्वर्णभूषित पादुका भरत को चित्रकूट से अयोध्या वापस आते समय दी थी । अतः इन अंशों को प्रक्षिप्त मानना चाहिए । दूसरी बात यह है कि धातुद्रावण ( धातुओं के गलाने ) का ज्ञान लोगों को बाद में हुआ । पहले तो लोग पत्थरों और हड्डियों के औजारों से लड़ते थे । लोहे का तीर बहुत बाद में बना । फिर उन पर नामोटंकन तो ईसा सन् के आस-पास ही लोगों ने जाना । अतः बाल्मीकीय रामायण में रामनामांकित अंगुलीय का वर्णन और रत्नजटित स्वर्णभूषित पादुका का वर्णन पीछे मिलाया गया है । परन्तु वैसी शंका निर्मूल ही है, क्योंकि दण्डकारण्य प्रस्थान के समय माता कौशल्या के पास जब उनकी अनुज्ञा प्राप्त करने भगवान् श्रीराम गये, तब माता ने राजकुमारों के योग्य आसन दिया । उस पर न बैठ कर केवल उसका स्पर्श करके कहा कि—मुझे दण्डकारण्य जाना है । इस आसन से अब क्या मतलब ? मेरे लिए तो विष्टर आसन इस समय चाहिए । चौदह वर्ष निर्जन वन में मुनियों के समान ( मसाला आदि डालकर बनाया हुआ मांस नहीं ) कन्दमूल फल से जीवनयात्रा चलाते हुए रहना है । 'गमिष्ये दण्डकारण्यं किमनेनासनेन मे । विष्टरासनयोग्यो हि कालोऽयं मामुपस्थितः ॥ २८ ॥ चतुर्दश हि वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने । कन्दमूलफलैर्जीवन् हित्वा मुनिवदामिषम् ॥ २९ ॥ ( अयो० का० २० ) यहाँ प्रश्न उठता है कि वे वन में गृहस्थाश्रम में गये हैं अथवा वानप्रस्थ आश्रम में ? उत्तर स्पष्ट है—अयोध्या में गृहस्थाश्रम में हैं । वहाँ से उनका निर्वासन हो रहा है । आश्रमान्तर प्राप्ति की कोई बात नहीं। गृहस्थ ही रहकर