काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८ ) वे वनवास में गये हैं। राज्य की सम्पत्ति उन्होंने छुई नहीं। फिर भी भगवान् श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा है कि—महाराज जनक के यज्ञ में महात्मा वरुण ने रौद्रदर्शन (देखने से ही हृदय कँपा देने वाले) दो धनुष, दो दिव्य अभेद्य कवच तथा सदा बाणों से भरे रहने वाले दो तरकस और सूर्य के समान चमकीले दो हेम (स्वर्ण) परिष्कृत तलवार ये सब हमको दहेज में दिये थे। आचार्य के घर से उन्हें लेकर तुम शीघ्र आओ। 'ये च राज्ञे ददौ दिव्ये महात्मा वरुणः स्वयम् । जनकस्य महायज्ञे धनुषी रौद्रदर्शने ॥ २९ ॥ अभेद्ये कवचे दिव्ये तूणीचाक्षयसायकौ । आदित्यविमलाभौ द्वौ खड्गौ हेमपरिष्कृतौ ॥ ३० ॥' (अयो० का० ३१) जिस धनुष को भगवान् राम ने तोड़ा वह धनुष भी वरुण ने महाराज जनक के पूर्वजों को दिया था। उसकी चर्चा जगदम्बा सीता ने माता अनसूया के सामने तथा महाराज जनक ने ब्रह्मर्षि विश्वामित्र और राम, लक्ष्मण के समक्ष किया है। दण्डकारण्य में महर्षि अगस्त्य ने स्वर्ण और हीरा जटित विश्वकर्मा द्वारा निर्मित विष्णुदैवत दिव्य धनुष, ब्रह्मा जी द्वारा प्रदत्त अमोघ सूर्य के समान तेजस्वी दिव्य बाण और इन्द्र द्वारा दिये हुये जाज्वल्यमान बाणों से सदा भरे रहने वाले दो तूणीर तथा सुवर्ण की म्यान और मुट्ठी वाली तलवार भी दी है। 'इदं दिव्यं महच्चापं हेमवज्रविभूषितम् । वैष्णवं पुरुषव्याघ्र निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ ३२ ॥ अमोघः सूर्यसंकाशो ब्रह्मदत्तः शरोत्तमः । दत्तौ मम महेन्द्रेण तूणी चाक्षयसायकौ ॥ ३३ ॥ सम्पूर्णौ निशितैर्बाणैर्ज्वलद्भिरिव पावकैः । 'महारजतकोशोऽयमसिर्हेमविभूषितः ॥ ३४ ॥ (अरण्यकाण्ड १२)