काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३४ ) जाते हैं। गंगोत्री से जल लेकर अति प्राचीन काल से धर्मप्राण जनता वहाँ चढ़ाने जाती है। धर्मशास्त्र और वेदान्तशास्त्र की मान्यतानुसार सेतुबन्ध रामेश्वर के दर्शन से ब्रह्महत्याओं के पाप दूर होते हैं। पुराणों में इन बातों का विशद वर्णन है। कूर्मपुराण पूर्व भाग के बीसवें अध्याय में आये इन श्लोकों से रामेश्वर की महत्ता तथा प्राचीनता स्पष्ट होती है— 'ये त्वया स्थापितं लिंगं द्रक्ष्यन्तीह द्विजातयः। महापातकसंयुक्तास्तेषां पापं विनश्यतु ॥ ४ ॥ अन्यानि चैव पापानि स्नातस्यात्र महोदधौ। दर्शनादेव लिङ्गस्य नाशं यान्ति न संशयः ॥ २० ॥ यावत्स्थास्यन्ति गिरयो यावदेषा च मेदिनी। यावत्सेतुश्च तावच्च स्थास्याम्यत्र तिरोहितः ॥ २१ ॥ इसी प्रकार के अन्य वचन स्कन्द पुराण तथा अन्य पुराणों में भी मिलते हैं। इन वचनों तथा मान्य ग्रन्थों के प्रमाणों के अतिरिक्त रामेश्वर नाम ही रामेश्वर मूर्ति और मन्दिर का भगवान् राम के साथ असाधारण सम्बन्ध स्थापित करता है। अतः सेतुबन्ध रामेश्वर की घटना वाल्मीकि रामायण द्वारा वर्णित रामेश्वर से भिन्न वस्तु नहीं हो सकती। सेतु निर्माण की घटना मात्र कल्पना नहीं है। वाल्मीकि रामायण में सेतु निर्माण की प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया गया है। उसका प्रारम्भ, समाप्ति, नाप जोख सब पर रामायण में प्रकाश डाला गया है। वाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड के २२ वें सर्ग के ५० से ७२ वें श्लोकों तक प्रतिदिन कितना निर्माण हुआ, कितने दिन में बनकर तैयार हुआ इसका ब्योरेवार वर्णन किया गया है। प्रथम दिन १४ योजन, दूसरे दिन २०, तीसरे दिन २१, चौथे दिन २२ एवं पाँचवें दिन २३ योजन के अनुपात से पाँच दिनों में सेतु बनकर पूर्ण तैयार हुआ था। इसकी लम्बाई १०० योजन तथा चौड़ाई १० योजन थी। आधुनिक युग मे विभिन्न देशों में निर्मित अत्यन्त विशाल सेतुओं की उपस्थिति उक्त सेतुबन्धन की घटना को वास्तविक मानने को बाध्य करती है।