भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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समुद्र वर्णन तथा दक्षिण भारत की स्थिति

वाल्मीकि रामायण में समुद्र, समुद्र की लहरें, जल-जन्तुओं, रत्नों, तटीय वस्तुओं, चन्द्रमा के कारण आने वाले समुद्री, ज्वार भाटों तथा अन्य समुद्र से सम्बद्ध वस्तुओं का जितना सजीव वर्णन किया गया है, उतना जीवन्त वर्णन किसी भी ऐसे व्यक्ति के द्वारा सम्भव नहीं है जिसने कभी समुद्र देखा ही न हो । उदाहरण के लिये सुन्दर काण्ड के प्रथम सर्ग में हनुमान् जी द्वारा समुद्र गमन के समय का वर्णन प्रस्तुत है । 'समुत्पतति वेगात्तु वेगात्ते नरोहिणः । संहृत्य विटपान् सर्वान् समुत्पेतुः समन्ततः ॥ १।४५ ॥' उन वृक्षों से नाना वर्ण के पुष्पों के समुद्र में गिरने से ऐसा लग रहा था आकाश में सुन्दर-सुन्दर रमणीय तारायें एक साथ उदय हो गई हों । 'तस्य वेगसमुद्भूतैः पुष्पैस्तोयमदृश्यत । ताराभिरभिरामाभिरुदिताभिरिवाम्बरम् ॥ १।५६ ॥ आकाश मार्ग से वायु में तैरते हुये हनुमान जी के दोनों बाहुओं के मध्य शरीर से टकराता हुआ वायु-मेघ के समान गर्ज रहा था । 'तस्य वानरसिंहस्य प्लवमानस्य सागरम् । कक्षान्तरगतो वायुर्जीमूत इव गर्जति । १।६५ ॥' समुद्र के जिस-जिस अंश से हनुमान जी निकलते थे वहाँ-वहाँ समुद्र में तूफान आ जाता था । यं यं देशं समुद्रस्य जगाम स महाकपिः । स तु तस्याङ्गवेगेन सोन्माद इव लक्ष्यते ॥ १।६९ ॥ महान् वेग वाले हनुमान महा समुद्र में उठी हुई मेरु और मन्दर के तुल्य बड़ी-बड़ी तरङ्गों को गिनते हुए से चले जा रहे थे । मेरुमन्दरसंकाशानुद्गतान् स महार्णवे । अत्यक्रामन्महावेगस्तरङ्गान गणयन्निव ॥ १।७३ ॥