भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 115 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 46

( ३९ ) अत्र पूर्वं महादेवः प्रसादमकरोद्विभुः ॥ २२ ॥ एतत्तु दृश्यते तीर्थं सागरस्य महात्मनः ॥ २० ॥ सेतुबन्ध इतिख्यातं त्रैलोक्येन च पूजितम् । एतत्पवित्रं परमं महापातकनाशनम् ॥ २१ ॥ एष सेतुर्मया वद्धः सागरे लवणार्णवे ॥ १७ ॥ कैलाश शिखराकारे त्रिकूटशखरे स्थिताम् । लंकामीक्षस्व वैदेहि निर्मितां विश्वकर्मणा ॥ ३ ॥ यत्र त्वं राक्षसेन्द्रेण रावणेन हृता वलात् ॥ ४५ ॥ एषा गोदावरी रम्या प्रसन्नसलिला शुभा ॥ ४६ ॥ ( युद्ध काण्ड सर्ग १२३ ) इसी तरह हिरण्यनाभ पर्वत १८, किष्किन्धा २२, ऋष्यमूक ३८, पम्पा ४०, पर्णशाला आश्रम ४२, ४४, शवरी मिलन स्थल ४१, अगस्त्य एवं शरभंग मुनियों के आश्रम ४६, चित्रकूट ४९, भरद्वाज आश्रम ५१, शृङ्गवेर- पुर ५२, इत्यादि स्थानों का वर्णन भगवान् राम ने किया है । इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित स्थान पूर्ण प्रामाणिक हैं । अब भी उन स्थानों की स्थिति तथा तीर्थ की दृष्टि से उनके महत्त्व पर किसी भी मान्य विद्वान् ने अपना मतभेद नहीं व्यक्त किया है । डाक्टर साकलिया ने वाल्मीकि रामायण को पूर्ण प्रामाणिक माना है फिर उसी ग्रंथ के किसी अंश को क्यों अप्रामाणिक माना जाय यह तर्क की दृष्टि से समझ में नहीं आता । ऐसा करना किसी मुर्गी के आधे अंग को पकड़कर खा जाने तथा आधे अंग को अण्डा देने के लिये रख छोड़ने की घटना के समान है । लंका की स्थिति ऊपर यह स्पष्ट किया जा चुका है कि रामायण में वर्णित स्थानों के लिये वाल्मीकि रामायण ही सबसे बड़ा प्रामाणिक ग्रन्थ है । इस रामायण के अनु- सार लंका समुद्र से सौ योजन दूर थी । इन लोगों द्वारा पूर्वी मध्य प्रदेश,