काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६ ) हनुमान जी के वेग जन्य वायु से समुद्र का जल आकाश में चला जाता था । नीचे तिमि, नक्र, बड़ी-बड़ी मछलियाँ बड़े-बड़े कच्छप ऐसे दिखाई देते थे जैसे कपड़ा हट जाने पर देह दिखाई देता है । 'तिमिनक्रझषाः कूर्मा दृश्यन्ते विवृतास्तदा । वस्त्रापकर्षणेनेव शरीराणि शरीरिणाम् ॥ १७५ ॥ समुद्र में रहने वाले सर्पों ने आकाश मार्ग पर हवा में तैरते हुए हनुमान जी को देखकर गरुड़ समझ लिया । 'क्रममाणं समीक्ष्याथ भुजगाः सागरङ्गमाः । व्योम्नि तं कपिशार्दूलं सुपर्णमिव मेनिरे ॥ १७४ ॥' महाबली कपि श्रेष्ठ हनुमान समुद्र में जिस-जिस मार्ग से निकलते थे उधर- उधर ऐसा लगता था मानो जल के पनाले बह रहे हों । 'येनासौ याति बलवान् वेगेन कपिकुञ्जरः । तेन मार्गेण सहसा द्रोणीकृत इवार्णवः ॥ १८०॥ इतना ही नहीं श्री वाल्मीकि ने समुद्र का ऐसा सजीव वर्णन किया है, जैसा आज तक किसी कवि ने किया ही नहीं । वाल्मीकि रामायण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थ में वर्णित वस्तु के विषय में 'अमुक स्थान पर ही होगी' की कल्पना निस्सार है । क्योंकि रामायण में वर्णित वस्तुओं, घटनाओं एवं स्थानों के विषय में तो निश्चितता है । परन्तु आधुनिक लोगों द्वारा तथाकथित अन्वेषणों के विषय में तो अनिश्चय की स्थिति बनी ही हुई है । ऐसी स्थिति में निश्चित प्रमाण को छोड़कर अप्रमाणिकता की ओर दौड़ना अन्धकारयुक्त मकान में वस्तुओं को खोजने के लिए प्रयास करने के समान है । महर्षि वाल्मीकि ने भगवान् राम के समुद्र तक पहुँचने के विभिन्न मार्गों का विशद वर्णन किया है । आज भी उसी मार्ग से दक्षिण भारत की तीर्थयात्रा हो जाया करती है । किष्किन्धा में बालि को मारकर राम ने चौमासा किया था । वह किष्किन्धा दक्षिण भारत में आज किष्किन्धा नाम से ही प्रसिद्ध है । वाल्मीकि रामायण में वर्णित किष्किन्धा की स्थिति को छोड़कर बिना किसी