भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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( ३७ ) प्रमाण के बेलारी या अन्य किसी स्थान पर उस स्थान की कल्पना वास्तविकता को अस्वीकार करना है। नासिक पञ्चवटी आदि स्थानों के विषय में भी शंकायें उठायी गई हैं। जो सर्वथा निर्मूल हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि नासिक का सम्बन्ध रामायण की महत्त्वपूर्ण घटना शूर्पणखा की नासिका-छेदन से है। पञ्चवटी भी वहीं है। रामायण में दोनों स्थानों का आस पास होना प्रमाणित होता है। आधुनिक काल में भी पञ्चवटी और नासिक एक ही स्थान पर हैं। इन स्थानों का वाल्मीकि रामायण के वर्णन से सादृश्य सम्बन्ध प्रतीत होता है। महाकवि ने रामायण में लगभग दो सौ आठ स्थानों का वर्णन किया है। इनमें से अधिकांश स्थान आज भी दक्षिण भारत में ही है। गोदावरी, कृष्णा, वरदा आदि नदियाँ, आन्ध्र, चोल, पाण्ड्य, केरल आदि स्थान दक्षिण भारत में ज्यों के त्यों विद्यमान हैं। समुद्र सम्बन्धी पर्वतों का वर्णन भी स्वाभाविक ढंग से हुआ है। वे पर्वत आज भी विभिन्न नामों से विभिन्न रूपों में अवस्थित हैं। वाल्मीकि रामायण में लंका जाते समय हनुमान का महेन्द्र पर्वत किष्किन्धा (काण्ड ६७ सर्ग श्लोक ३९) तथा लौटते समय अरिष्ट पर्वत (सुन्दर काण्ड ५६ सर्ग श्लोक २६) पर चढ़ना बताया गया है। इसी तरह सुवेल, सह्य, मलय इत्यादि पर्वतों का भी वर्णन किया गया है। इन सब वाल्मीकि रामायण में वर्णित एवं आधुनिक जगत् में प्रसिद्ध वस्तुओं एवं स्थानों में वाल्मीकि रामायण में वर्णित अर्थ ही प्रमाणित होता है। अतः यह कहना तथ्यों से विपरीत है कि महर्षि वाल्मीकि को दक्षिण भारत की भौगोलिक स्थिति एवं उसके रीति रिवाजों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। जहाँ तक दक्षिण में शव गाड़ने की प्रथा का प्रश्न है, आधुनिक इतिहास के आधार पर उसे प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। आधुनिक इतिहास मात्र ६ हजार वर्ष पुराना है जबकि वाल्मीकि रामायण में वर्णित बाली के शव

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