काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३८ ) दाह की घटना करोड़ों वर्ष पुरानी घटित घटना है । रामायण की संस्कृति, सर्वथा वैदिक संस्कृति है । राम, रावण, बाली इत्यादि वैदिक संस्कृति के व्यक्ति थे । हनुमान जी भारतीय संस्कृति के अध्येता थे । वैदिक संस्कृति में 'भस्मान्तम् शरीरम्' इत्यादि वेद-मन्त्र के अनुसार प्राचीन शवदाह का ही समर्थन किया गया है । अतः बाली एवं रावण के शवदाह का आदेश देना वैदिक संस्कृति के अनुसार सर्वथा उपयुक्त था । शव को गाड़ने की कल्पना कथंचित् हो भी तो वह मध्यकाल की बात हो सकती है । इसको दक्षिण भारत का शाश्वतिक धर्म नहीं माना जा सकता । उधर भारत में भी साधु, संन्यासी, संत, महात्मा इत्यादियों को जलाया नहीं जाता, उनकी समाधि बनती है, छोटे एवं असंस्कृत बालकों के शव के साथ भी यही होता है । कहीं-कहीं प्लेग इत्यादि की बीमारी में मरे वयस्क पुरुषों के शवों को भी गाड़ा ही जाता है, उन्हें जलाया नहीं जाता है । हमारे यहाँ शवों के संबंध में सर्वत्र दहन, खनन एवं प्लावन की परम्परा हैं । अतः इनमें से किसी एक को किसी भाग विशेष की परम्परा नहीं माना जा सकता । जिस प्रकार किसी मुस्लिम बहुल प्रदेश में कब्रों को देख कर यह निर्विवाद निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि यहाँ केवल कब्र ही बनती रही हैं, उसी प्रकार किसी स्थान विशेष पर शव गाड़ने की प्रक्रिया को लेकर यह नहीं कहा जा सकता कि वहाँ पर सदा शव गाड़े ही जाते रहे हैं । यह बात तत्का- लिक ऐतिहासिक हो सकती है पर शाश्वतिक ऐतिहासिक नहीं है । जहाँ तक वाल्मीकि रामायण में वर्णित स्थानों का प्रश्न है, वह अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण है । वानरराज सुग्रीव ने बन्दरों द्वारा सीता के अन्वेषण के लिये जिन स्थानों का वर्णन किया है वह अत्यन्त सजीव तथा किसी भी अन्वेषण करने वाले के लिये महत्त्वपूर्ण सामग्री सिद्ध हो सकती है । प्रारम्भ में जो-जो घटनाएँ जिन-जिन स्थानों पर घटित हुई थीं, लंका विजय के पश्चात् लौटते भगवान् राम ने भगवती सीता से उन सभी स्थानों तथा घटनाओं का वर्णन किया है ।