काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका आधुनिक पाश्चात्त्य शिक्षा-दीक्षा में शिक्षित विद्वानों की लम्बी अवधि के काल को ईसवी सन् के अन्दर ही रखने की भावना बन गयी है। यदि वे बहुत ऊपर उठे तो ईसवी सन् से सौ-दो-सौ वर्ष पहले ले जाते हैं। अरबों वर्ष का समय इस प्रकार कुल तीन हजार वर्ष के अन्दर ही आ जाता है। इस प्रकार इन लोगों के विचार आस्तिकों पर भी छाने लगते हैं और उनका शास्त्रों पर का अटल विश्वास भी डगमगाने लगता है। उसे संभालने के लिए मनीषियों का सुदृढ़ प्रयत्न होता है। भारतीय साहित्य में इतिहास रूप से दो आर्ष ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं और भारतीय जनता पर उनकी अमिट छाप पड़ी है। वे हैं (१) रामायण और (२) महाभारत। वैसे काश्मीर के इतिहास में एक कल्हण की राजतरङ्गिणी प्रसिद्ध है। किन्तु वह ऋषि प्रोक्त नहीं है। पाश्चात्त्य विद्वानों ने उन पर अपनी दृष्टि से विचार किया है और उनकी शिक्षा-दीक्षा में पले हुए आधुनिक भारतीय विद्वान् भी विभिन्न लेखों, ताम्रलेखों और पुरातत्त्व के आधार पर उन्हीं पाश्चात्त्य विद्वानों द्वारा स्वबुद्धि प्रसूत अटकल के द्वारा उपजी हुई बातों को परीक्षा द्वारा सुदृढ़ करने पर तुले हुए हैं। इस विषय में डाक्टर सांकलिया द्वारा प्रयास समाचारपत्रों के माध्यम से जनता के सम्मुख आया और सभाओं में तथा पृथक् पत्रों द्वारा लोगों ने सकल शास्त्र रहस्यज्ञ सनातन धर्म के मूर्तिमान् स्वरूप विशुद्ध देहधारी संन्यास के प्रतीक पूज्यपाद गुरुदेव श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज से प्रश्न करना प्रारम्भ किया तो उन्होंने सोचा कि इसके निर्णय के लिए एक सम्मेलन बुलाया जाय और वहीं सभी विचारकों के समक्ष इसका निर्णय किया जाय। पहले वाराणसी में ही वह सम्मेलन करने की बात हुई; किन्तु फिर विचारा गया कि अभी थोड़े समय में प्रयाग में कुम्भ होने वाला है वहीं यह विचार ठीक रहेगा, अतः संवत् २०३३ में प्रयाग में कुम्भ मेला के अवसर पर महाभारत और रामायण के समय निर्धारण के