काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २ ) लिए सम्मेलन बुलाया गया। उसमें पौरस्त्य और पाश्चात्य दोनों ही सिद्धान्तों के विद्वान् उपस्थित हुए। पौरस्त्य विद्वानों में पूज्यपाद जगद्गुरु शङ्कराचार्य (पुरी) श्रीस्वामी निरञ्जन देवतीर्थ तथा पाश्चात्य सिद्धान्त के विद्वानों में इन्दौर विश्वविद्यालय के ग० ब० कवीश्वर का नाम विशेषरूप से उल्लेखनीय है। दो दिनों तक लगातार विचार चला। उसमें मध्यस्थ पूज्यपाद गुरुदेव श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज थे। यह विशेष ध्यान देने की बात थी कि कुम्भ मेला में कोई विचार अपना भी इस विषय में जनता के समक्ष दिया जाय। इसलिए संवत् दो हजार तैंतीस में ही अतिशीघ्रता में पूज्यपाद गुरुदेव ने रामायण-महाभारत काल मीमांसा लिखी और वह कुम्भ के समय ही प्रकाशित हुई। उसके कुछ पृष्ठ उसी सम्मेलन में पूज्यपाद गुरुदेव ने पढ़कर सुनाया भी था। विचार यद्यपि जमकर हुआ तथापि उसमें कतिपय अंश जैसे गीता जयन्ती, युद्ध के दिन, भीष्म निर्वाण आदि पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं हो सके। इन पर विचार करने के लिये चातुर्मास्य का समय निश्चित किया गया और संवत् २०३४ में जबकि पूज्यपाद गुरुदेव का चातुर्मास्य वाराणसी में वृन्दावन विहारी भवन में हो रहा था, वहीं यह विचार चला। इस विचार के लिये श्री वृन्दावन धाम से दो (श्री स्वामी चिन्मयानन्द एवं श्री स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती) महात्मा दण्डी स्वामी भी पधारे थे। जिसमें श्री निश्चलानन्दजी महाराज का नाम विशेष उल्लेख्य है। उस विचार विनिमय में इन पंक्तियों का लेखक भी भाग लेता था। अनध्यायों में भी जैसे प्रतिपद, अष्टमी, चतुर्दशी आदि में विचार हुआ। विचार होने पर जो निर्मन्थितार्थ निकला उसका सङ्कलन श्री स्वामी निश्चलानन्दजी महाराज ने किया और उसे पूज्यपाद जगद्गुरु शङ्कराचार्य जी महाराज को हमने ट्रेन में उन्हीं के साथ यात्रा करते हुए सुनाया। सुनकर हार्दिक सन्तोष प्रकट करते हुए प्रसन्नता के शब्दों में उनके मुख से यह उद्गार निकला कि "जब इसका प्रकाशन हो तो मैं अपना कार्यक्रम स्थगित कर काशी रहूँगा और इसमें प्रूफ रीडिंग से लेकर पूर्ण सम्पादन तक सारा कार्य करूँगा।" इतनी सुन्दर वह वस्तु थी किन्तु दैव दुर्विपाक से कहीं लुप्त हो गयी। फिर संवत् २०३५ के चातुर्मास्य में (वेद शास्त्रानुसन्धान भवन केदार घाट, वाराणसी में हो रहा है) श्री स्वामी निश्चलानन्द महाराज पधारे हैं। इन्होंने पूर्ण उत्साह