काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४१ ) विरुद्ध बात नहीं पाई गई है। इसके विपरीत युग से प्रचलित इन कथाओं में आश्चर्यजनक रूप से एकरूपता बनी हुई है। यह तथ्य वाल्मीकि रामायण की प्रामाणिकता के लिये सबसे बड़ा आधार है। हमारे यहाँ वेदों की आचार्य परम्परा मानी जाती है। गुरु-शिष्य सम्प्रदाय परम्परा से जैसे वेदों की रक्षा होती रही है, वैसे ही गुरु-शिष्य परम्परा से ही रामायण तथा पुराण की भी रक्षा होती रही है। इसीलिए रामायण में यदि कोई नयी चीज प्रवृष्ट हुई तो उसे रामायण का प्रसिद्ध अंश न मानकर क्षेपक की संज्ञा दे दी गयी। वाल्मीकि रामायण के टीकाकारों ने तत्तत्क्षेपकों को न मानने का यही आधार बताया कि 'इनकी सम्प्रदाय प्राप्त व्याख्या नहीं है' अतः क्षेपक प्रमाण नहीं माने जा सकते। बस; इसी सम्प्रदाय विशेष के कारण ही वाल्मीकि रामायण के मौलिक रूप की रक्षा होती रही है। अतः यह कहना ठीक नहीं है कि वाल्मीकि रामायण की कथाओं में कालान्तर में व्यापक काट छांट किया गया। रामायण में महाभारत की चर्चा नहीं है। महाभारत एवं काव्यों में तथा कालिदास, अश्वघोष प्रभृति कवियों ने भी रामायण की चर्चा की है। बौद्ध जातकों तथा जैन ग्रन्थों में रामायण का वर्णन है पर वह प्रामाणिक नहीं। इस लिये इनके आधार पर राम कथाओं के भिन्न रूप बने भी हैं पर वाल्मीकि रामायण में जो इसकी चर्चा है वही प्रामाणिक है। अनेक विदेशी विद्वानों ने भी राम कथा के सम्बन्ध में वाल्मीकि रामायण को ही सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रामाणिक ग्रन्थ माना है। भारतीय संस्कृति का संदेशवाहक यह महान् ग्रन्थ रामकथा सागर में युगों से भारतीयों को गोता लगवाता हुआ आज भी प्रत्येक भारतीय को उसमें गोता लगा कर अपने जीवन को मानवता के उदात्त आदर्शों के अनुसार जीने की पवित्र प्रेरणा दे रहा है। ऐसे प्रामाणिक ग्रन्थ को छोड़ कर निराधार कल्पना के सहारे नयी खोजों का दावा करना बौद्धिक स्तर से नीचे उतरने की बात है। आधुनिक लोग वाल्मीकि रामायण के अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुन्दर एवं लंका इन पाँच काण्डों को प्रामाणिक मानते हैं और कहते हैं कि इनमें राम