काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४२ ) को भगवान् का अवतार नहीं माना गया, पर वाल्मीकि रामायण में प्रारम्भ से लेकर अन्त तक सर्वत्र ही राम को विष्णु का अवतार माना गया है । अतः राम को गुप्त काल में विष्णु का अवतार कहा गया, यह बात पूर्णतया गलत है । उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि वाल्मीकि रामायण की सभी घटनाएँ पूर्ण प्रामाणिक हैं । भारतीय संस्कृति, परम्परा तथा धार्मिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों के मूल रहस्य इसी ग्रन्थ में सुरक्षित हैं । मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम को आधुनिक इतिहास की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता । किसी मान्य ग्रन्थ के कुछ अंश को प्रामाणिक तथा कुछ को अपनी आधारहीन बातों को सिद्ध न कर सकने की दशा में अप्रामाणिक मानने की दुराग्रही दृष्टि का परित्याग इस समय अत्यावश्यक है । सभी लोगों को धार्मिक तथा आध्यात्मिक ग्रन्थों की बातों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने के प्रयास से अपने को दूर रखने का प्रयास करना चाहिए । धार्मिक ग्रन्थों के विषय में ऐसी बातों से तनाव एवं विवाद का वातावरण पैदा हो जाता है । हमें ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना है जिससे इस समय देश में कोई दूसरी समस्या उपस्थित हो । रामायण की घटनाओं के विषय में धर्माचार्यों का निर्णय ही एकमात्र दिशानिर्देशक होना चाहिए । कालनिर्धारण में पूर्वाग्रह अनुचित यद्यपि मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद अनादि हैं, अनादि काल से ही हम लोगों के पूर्वज उन्हें अपौरुषेय मानते आये हैं, मीमांसादि शास्त्रों में इनकी अनादिता अपौरुषेयता बड़े समारोह से सिद्ध की गई है, तथापि मेक्समूलर, प्रो० वेण्टली, प्रो० बायो, प्रो० वेबर, प्रिसिपल थीबो, म० म० सुधाकर द्विवेदी, लोकमान्य तिलक, पं० शंकर बालकृष्ण दीक्षित, ज्योतिर्विद् केतकर आदि ने वेदों का निर्माण काल ६ हजार वर्ष माना है । गोडबोले, लेले, आदि इससे अधिक चौबीस हजार वर्ष आगे बढ़े हैं । पुरातत्त्वज्ञ दास बाबू ८० हजार वर्ष वेद काल मानते हैं ।