काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४५ ) विषुवत् वाले दिन चित्रा स्वाती के मध्य में ही उदय होता है) इस भाष्य के अनुसार 'विषुवतीय' शब्द से भी यही प्रतीत होता है कि चित्रा स्वाती के मध्य में सूर्य के उदय-अस्त का दिन वसन्त सम्पात ही है । क्योंकि जब उस दिन रात समान होते हैं उसी को विषुवतीय दिन कहा जाता है । यह शरद् सम्पात और वसन्त सम्पात में ही होता है। कारण उस दिन क्रान्ति वृत्त (जिस पर सूर्य चन्द्र आदि ग्रह घूमते हैं) पर घूमते-घूमते सूर्य विषुवत् वृत्त (दैनिक भ्रमण के लिए निश्चित मार्ग) पर आता है। उत्तर गोलार्ध से दक्षिण गोलार्ध पर जाते समय सूर्य के विषुवत् वृत्त पर पहुँचने पर शरद् सम्पात और दक्षिण गोलार्ध से उत्तर गोलार्ध की ओर जाते समय सूर्य के विषुवत् वृत्त में पहुँचने पर बसन्त सम्पात होता है । पर यह स्थिर नहीं होता, सूर्य विषुवत् वृत्त में एक स्थान पर न काटकर कुछ पीछे हटते हुए सम्पात पर आता है। इसी को अयन चलन कहा जाता है। इसीलिए वर्तमान की अयन गति के गणित से बसन्त सम्पात को अपने स्थान पर आने में लगभग २६ हजार वर्ष बीतते हैं। तथा च उत्तर की ओर बढ़ते हुए सूर्य के उदय होने के क्रम में जो विषुव दिन होता है वह बसन्त सम्पात का ही माना जाता है, शरद् सम्पात का नहीं। इस विचार के अनुसार कर्काचार्य का समय पन्द्रह हजार वर्ष प्राचीन है। फिर कात्यायन श्रौतसूत्रादिकों का समय उससे अति प्राचीन होगा। वेदों का समय क्या कहा जाय, वे तो अनादि काल से प्रवृत्त हैं। वेदार्थ के उपबृंहण के लिए रामायण और महाभारत की रचना हुई है। अतः उनके निर्माण काल के विषय में विचार करना आवश्यक है। मनु, व्यास और जैमिनि की दृष्टि में तो मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद अनादि और अपौरुषेय हैं। स्वयं वेद की दृष्टि में भी वेद नित्य और अनादि हैं। जैसा कि इन वचनों से स्पष्ट होता है। 'वाचा विरूप नित्यया' (ऋ० सं० ८।७५।६) 'पूर्वे पूर्वेभ्यो वच एतदूचुः' (तै० ब्रा० ३।१२।९।२ ) 'अत एव च नित्यत्वम्' (ब्र० सू० १।३।२९) 'शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्' (ब्र० सू० १।३।२८) 'आख्याप्रवचनात्' (जै० सू० १।१।३०) ।