काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४४ ) उस दिन शरद् सम्पात (अर्थात् शरद् ऋतु का प्रारम्भ) और क्रमशः उत्तर की ओर बढ़ते-बढ़ते जिस दिन उदयास्त पूर्व पश्चिम रेखा पर होता है उस दिन वसन्त सम्पात (वसन्त का प्रारम्भ) होता है । ‘समे शंकुं निखाय शंकुसम्मितया रज्ज्वा मण्डलं परिलिख्य यत्र लेखयोः शंक्वग्रच्छाया निपतति तत्र शंकुं निहन्ति सा प्राची’ (शुल्ब सूत्र २) इस सूत्र का भाष्य करते हुए कर्काचार्य लिखते हैं—“दक्षिणायने तु चित्रां यावदादित्य उपसर्पति उदगयने स्वातीमेति, विषुवतीये त्वहनि चित्रा स्वात्योर्मध्य एवोदयः । अतस्तन्मध्ये शंकुगतैवच्छाया भवति । एवञ्च सति अहरन्तरेषु सैव प्राची न भवतीत्यत्रोच्यते । ‘तं प्राञ्चमुद्धरति’ इत्यनेन प्राच्युद्धरणे कृते अनेकाहसाध्येऽपि कर्मणि तदेवोद्धरणमित्यहरन्तरे दोषो न भवति ।’ अर्थात् सूर्य चित्रा पर जब तक रहते हैं तब तक दक्षिणायन रहता है । स्वाती पर पहुँचने पर उत्तरायण हो जाता है । अर्थात् स्वाती नक्षत्र पर पहुँचने तक दक्षिणायन रहता है । जब सूर्य चित्रा को पार कर जाता है और ‘स्वाती पर नहीं पहुँचता; इस चित्रा स्वाती के मध्य के काल में ठीक पूर्व पश्चिम रेखा पर उदयास्त होता है । इस कारण उस दिन द्वादशांगुल शंकु की छाया से साधी हुई पूर्व पश्चिम की रेखा शंकु को पार कर जाती है । अन्य दिनों में भी शंकु की छाया के अग्र भाग के मण्डल में प्रवेश निर्गम चिह्नों से पूर्व पश्चिम रेखा होती है किन्तु वह शंकु को पार नहीं करती । साल भर में जिस दिन सूर्य चित्रा स्वाती के मध्य में आता है उस दिन के सूर्योदय से साधित की हुई प्राची अन्य दिनों में भी उपयुक्त होती है । कर्काचार्य के इस कथन से यह सिद्ध होता है कि उनके समय में वसन्त सम्पात ठीक चित्रा स्वाती के मध्य में हुआ करता था । क्योंकि वसन्त सम्पात के दिन ही सूर्य का उदयास्त पूर्व पश्चिम रेखा पर होता था । यद्यपि उस दिन शरद् सम्पात भी कहा जा सकता है तथापि इस प्रसङ्ग में ‘उदगयने स्वातीमुपैति’ (उत्तरायण में स्वाती पर पहुँचते हैं) इस वचन के अनुसार उत्तरायण के प्रसङ्ग में वसन्त सम्पात ही हो सकता है । इसके अतिरिक्त इसी प्रसङ्ग में ‘विषुवतीये त्वहनि चित्रास्वात्योर्मध्य एवोदयः’