काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४७ ) शासनाद्वापि मोक्षाद्वा स्तेनः पापात्प्रमुच्यते । राजत्वशासन् पापस्य तदवाप्नोति किल्विषम् ॥ ३२ ॥' ( श्री वा० रा० कि० का० १८. ) कुछ हेर-फेर से ये श्लोक मनुस्मृति में मिलते हैं । 'शासनाद्वा विमोक्षाद्वा स्तेनः स्तेयाद्विमुच्यते । अशासित्वा तु तं राजा स्तेनस्याप्नोति किल्विषम् ॥ ३१६ ॥ राजभिः कृतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ ३१८ ॥ ( मनुस्मृति अध्याय ८ ) श्री मद्वाल्मीकीय रामायण चौबीसवें त्रेता में भगवान् श्रीराम के अवतार के समय बना है और मनुस्मृति इस वैवस्वत मनु के पहले जबकि ६ मनु और बीत चुके हैं। इसे सर्वप्रथम स्वायम्भुव मनु के उपदेश से भृगु ने निर्माण किया है। उद्धरण की प्रक्रिया के अनुसार मनुस्मृति का काल सृष्टि के प्रारम्भ से ही होने के कारण वर्तमान संवत् २०३५ तक १ अरब ९५ करोड़ ८८ हजार ७९ वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। वस्तुतः दैव असुर दो प्रकार के भूतसर्ग बराबर ही चला करते हैं तथा सृष्टि प्रक्रिया भी पूर्ववत् ही चला करती है। यह श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है— 'भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।' ( श्री० म० भा० गी० ८।१९ ) अतः आस्तिकता-नास्तिकता दोनों ही सिद्धान्त अनादि काल से ही प्रचलित हैं। नया कोई सिद्धान्त नहीं है। इसी सृष्टि से श्री मद्वाल्मीकीय रामायण में बुद्ध का नाम आना असमञ्जस नहीं है। वेदों में भी 'कथमसतस्सज्जायेत' आदि कहकर इस असद्वाद ( शून्यवाद ) का खण्डन किया है। इस समय श्रीकृष्ण द्वैपायन द्वारा निर्मित पुराण उपलब्ध हैं, किन्तु इसके पहले भी ब्रह्मा जी द्वारा प्रोक्त पुराण थे। उनकी चर्चा वेदों और वाल्मीकीय रामायण में है।