काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 63, कुल 115 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५२ ) 'प्रयाध्वं वै कुरुक्षेत्रं पुष्योद्येति पुनः पुनः' ( उद्योग० १५०।३ ) इस दुर्योधन वाक्य से यह सिद्ध होता है कि रेवती से पुष्य नक्षत्र तक शान्तिवार्ता के सन्दर्भ में भगवान् श्रीकृष्ण के व्यतीत हुए । दुर्योधन की सेना ने असफल शान्तिवार्ता के दिन ही कुरुक्षेत्र के लिए प्रस्थान किया । साथ ही रात्रि विश्राम के अनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण के निम्नलिखित वचन से यह सिद्ध होता है कि दूसरे दिन भी पुष्य नक्षत्र का योग था— न कुर्वन्ति वचो मह्यं कुरवः कालनोदिताः । निर्गच्छध्वं पाण्डवेयाः पुष्येण सहिता मया ॥ ( शल्य० ३५।१० ) अस्तु ! पाण्डव सेना ने भी 'पुष्य' में ही कुरुक्षेत्र के लिए प्रस्थान किया । इस तरह 'रेवती हस्तिनापुर के लिये प्रस्थान नक्षत्र' और 'पुष्य सैन्य- निर्याण दिवस' सिद्ध होता है । श्री भगवान् के 'सप्तमाच्चापि दिवसाद्मावास्या भविष्यति, ...... तामाहुः शक्रदेवताम्' इस सन्देश से इस तथ्य का प्रकाश होता है कि इन्द्र देवता सम्बन्धी ज्येष्ठा नक्षत्र में मार्गशीर्ष की अमावास्या थी । अतः उससे पूर्व श्री कृष्ण का हस्तिनापुर प्रस्थान के दिन कार्तिक शुक्ल एकादशी या द्वादशी और सैन्य निर्याण के दिन पञ्चमी तिथि सिद्ध होती है । यद्यपि 'इन्द्रस्य चित्रा' ( तैत्तरीय ब्राह्मण १।५।१ ) इस श्रुति के अनुसार गौणीवृत्ति से चित्रा ऐन्द्र नक्षत्र है और ज्योतिषशास्त्र की प्रसिद्धि के अनुसार कृत्तिका के अग्नि और ज्येष्ठा के इन्द्र स्वतन्त्र देवता हैं । परन्तु तिथि के अनुगुण आद्योपान्त नक्षत्रोप- लब्धि को देखते हुए प्रसंगानुसार इन्द्र ज्येष्ठा के अधिपति रूप में ग्राह्य हैं । स्वयं श्री वेदव्यास को भी इस सन्दर्भ में यही मत मान्य है— श्वेतो ग्रहः प्रज्वलितः सधूम इव पावकः । ऐन्द्रं तेजस्वि नक्षत्रं ज्येष्ठामाक्रम्य तिष्ठति ॥ ( भीष्मपर्व ३।१६ )