काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५१ ) का अन्त और हेमन्त का आरम्भ हो रहा था। सब ओर पर्याप्त उपजी हुई खेती लहलहा रही थी।'" यद्यपि उपप्लव्य से चलकर रात्रि विश्राम वृकस्थल में वर्णित है (उद्योग पर्व ८४।१५-२३)। वृकस्थल उन पाँच गाँवों में एक था, जिनके मिल जाने पर पाण्डव बिना युद्ध के भी सन्तुष्ट हो सकते थे— अविस्थलं वृकस्थलं माकन्दीं वारणावतम्। अवसानं भवेत्तत्र किञ्चिदेकं च पञ्चमम्॥ (उद्योग० ३१।१९) पुनः रात्रि बीतने पर हस्तिनापुर पहुँचने का उल्लेख है (उद्योग० ८५। १६-१८; ८६।१), फिर विदुर जी के घर में रात्रि विश्राम का वर्णन है (उद्योग० ९१।४१)। तत्पश्चात् प्रातः से सायं तक कौरव-सभा में असफल शान्तिवार्ता का निरूपण है। उसी दिन श्रीकुन्तीदेवी से पाण्डवों के लिये युद्ध की आज्ञा प्राप्त कर तथा कर्ण को एकान्त में कौन्तेय बताकर उनसे पाण्डव पक्ष में सम्मिलित होने के अनुरोध का वर्णन है। अन्त में कर्ण के अस्वीकार करने पर भीष्म, द्रोण, शल्य एवं दुर्योधन के प्रति युद्धारम्भ सम्बन्धी सन्देश की घोषणा है— सप्तमाच्चापि दिवसाद्अमावास्या भविष्यति। संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्रदेवताम्॥ (उद्योग० १४२।१८) “आज से सातवें दिन अमावास्या होगी। उसके देवता इन्द्र कहे गये हैं। इसी में युद्ध प्रारम्भ किया जाय।” तत्पश्चात् उपप्लव्य आकर पाण्डवों और समुपस्थित राजाओं को सन्देश सुनाकर रात्रि विश्राम का वर्णन है। इस तरह उपप्लव्य से चलकर पुनः उपप्लव्य लौट आने तक तीन दिनों ही विवरण प्राप्त होने पर भी पाण्डवों से भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा कथित