भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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'पौर्णमासीं च कार्तिकीम्' (भीष्म० ग२३), 'कृष्ण चतुर्दशीम्' (भीष्म पर्व ३।३३), 'अमावास्यां त्रयोदशीम् (भीष्म० ३।३२) 'सप्तमाच्चापि दिवसाद्मावास्या भविष्यति' (उद्योग० १४२।१८) 'त्रिभाग शेषः पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति' (अनुशासन० १६७।२८) में कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष का स्पष्ट उल्लेख पक्ष निर्णय में उपयोगी है। इन्हीं वचनों से तिथि का भी निर्देश प्राप्त होता है। रेवती, ऐन्द्र (ज्येष्ठा), श्रवण, पुष्य, अनुराधा नक्षत्र के उल्लेख भी तिथि निर्णय के साथ ही तिथि निर्णय में भी उपयोगी हैं। 'सप्तमाच्चापि दिवसात्' (उद्योग० १४२।१८), 'चत्वारिंशदहान्यद्य द्वे च' (शल्यपर्व ३४।६), 'अष्टपञ्चाशतं रात्र्यः' (अनुशासन० १६७।२७), 'अष्टादशाभवत्' (आदि० २।३८१) आदि वचन दिन संख्या के द्योतक हैं। इस तरह महाभारत युद्धकाल का निर्णय करते समय वर्ष, अयन, मास, पक्ष, तिथि, नक्षत्र और दिन संख्या की दृष्टि से विचार कर्तव्य है। पृष्ठभूमि भगवान् श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के दूत और नायक होकर हेमन्त ऋतु के शुभागमन पर कौमुद मास (कार्तिक) रेवती नक्षत्र में उपप्लव्य नगर से हस्तिनापुर के लिये प्रस्थान किया— ततो व्यपेततमसि सूर्ये विमलवोद्गते । मैत्रे मुहूर्ते सम्प्राप्ते मृदर्चिषिदिवाकरे ॥ कौमुदे मासि रेवत्यां शरदन्ते हिमागमे । स्फीतसस्य सुखे काले कल्पः सत्त्ववतां वरः ॥ (महा० उद्योग० ८३।६,७) "उसके बाद जब रात्रि का अन्धकार दूर हुआ और निर्मल आकाश में सूर्यदेव का उदय होने पर उनकी कोमल किरणें सब ओर फैल गयीं, कार्तिक मास के रेवती नक्षत्र में मैत्र नामक मुहूर्त उपस्थित होने पर सत्त्वगुणी पुरुषों में श्रेष्ठ एवं समर्थ श्रीकृष्ण ने यात्रा प्रारम्भ की। उन दिनों शरद ऋतु

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