भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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( ४९ ) "धर्मराज युधिष्ठिर के राज्य में कहीं कोई अधर्मयुक्त कार्य नहीं होता था। सब लोग धर्मविषयक रुचि रखते थे। पुरुष सिंह ! जैसे सत्ययुग में समस्त प्रजा धर्मपरायण रहती थी, उसी प्रकार उस समय द्वापर में भी हो गयी थी।" "कलियुग को समीप आया देख बुद्धिमान नृपनन्दन युधिष्ठिर उसका निर्वासन कर भाइयों के साथ धर्मबल से अजेय होकर शोभा पाने लगे।" भीमसेन द्वारा अनीति पूर्वक आघात से दुर्योधन के पराजित होने पर क्रुद्ध श्रीबलराम को समझाते हुए 'प्राप्तं कलियुगं विद्धि प्रतिज्ञां पाण्डवस्य च।' (शल्य० ६०।२५) श्रीकृष्ण भगवान् के इस वचन से युद्धकाल में कलियुग के प्रवेश का प्रभाव विदित होता है। साथ ही— अन्तरे चैव सम्प्राप्ते कलिद्वापरयोरभूत् । समन्तपञ्चके युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥ ( महा० आदि० २।१३ ) इन श्लोकों के अनुशीलन से महाभारत युद्ध के वर्ष का संकेत प्राप्त है। युद्धारम्भ और युद्धान्त के संदर्भ में सप्ताह के सात दिनों में किसी भी दिन का उल्लेख महाभारत में नहीं है, अतः दिन की दृष्टि से विचार असम्भव है। 'शरदन्ते हिमागमे' ( उद्योग० ८३।६, ७), 'निवृत्तमात्रे त्वयन उत्तरे वै दिवाकरे।' ( शान्ति० ४७।३ ), 'विनिवृत्ते दिनकुरे प्रवृत्ते चोत्त्- रायणे।' ( अनुशासन० १६६।१४ ) । इन स्थलों में हेमन्त एवं दक्षिणायन का उल्लेख स्पष्ट ही 'अयन' को सिद्ध करता है। युद्ध के सन्दर्भ में शरद् का अन्त, हेमन्त का प्रारम्भ, कौमुद (कार्तिक) मास का उल्लेख निश्चय ही उपयोगी है। ४

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