काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 65, कुल 115 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५४ ) देखा गया है, परन्तु इस पक्ष में तेरहवें दिन यह अमावास्या आ गई है, ऐसा पहले भी कभी हुआ है, इसका मुझे स्मरण नहीं है । इस एक ही मास में तेरहवें दिन चन्द्र और सूर्य दोनों ग्रस्त हुए ।।" भगवान् श्रीकृष्ण के बचन से भी यही सिद्ध होता है— एवं पश्यन् हृषीकेशः सम्प्राप्तं कालपर्ययम् । त्रयोदश्याममावास्यां तान् दृष्ट्वा प्राब्रवीदिदम् ।। चतुर्दशी पञ्चदशी कृतेयं राहुणा पुनः । प्राप्ते वै भारते युद्धे प्राप्ता चाद्य क्षयाय नः ।। ( महा० मौसल० २।१८, १९ ) "इस तरह काल का उलट-फेर प्राप्त हुआ देख और तेरहवें दिन अमावास्या का संयोग जान् भगवान् श्रीकृष्ण ने सब लोगों से कहा--वीरो ! इस समय राहु ने फिर चतुर्दशी को ही अमावास्या बना दिया है । महाभारत युद्ध के समय जैसा योग था, वैसा ही आज भी है । यह सब हम लोगों के विनाश का सूचक है ।।" परन्तु प्रश्न उठता है कि मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष त्रयोदश दिनों का था या पौष कृष्ण ? अलक्ष्यः प्रभयाहीनः पौर्णमासीं च कार्तिकीम् । चन्द्रोभूदग्नि वर्णश्च पद्मवर्णं नभस्तले ।। ( भीष्मपर्व २।२३ ) मांसवर्षं पुनस्तीव्रमासीत् कृष्ण चतुर्दशीम् ।। ( भीष्मपर्व ३।३३ ) उक्त स्थल में कार्तिकी पूर्णिमा के पश्चात् कृष्ण चतुर्दशी का उल्लेख है, साथ ही उसके लिए 'आसीत्' शब्द का प्रयोग है; अतः मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का ही संकेत प्राप्त श्लोक में हुआ है, ऐसा सभी मानते हैं । अब क्योंकि श्रीकृष्ण वचन से यह सिद्ध है कि चतुर्दशी को राहु ने पञ्चदशी