भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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( ५५ ) (अमावास्या) बना दिया और 'इमां तु नाभिजानेहममावास्यां त्रयोदशीम् । (भीष्म पर्व ३।३२)' यह व्यास वचन भी है, अतः कृष्ण चतुर्दशी का अभिप्राय - अमावास्या ही ग्राह्य है । चन्द्रादित्यावुभौ ग्रस्तावेकाह्ना हि त्रयोदशीम् । अपर्वणि ग्रहं यातौ प्रजा संक्षयमिच्छतः ॥ ( भीष्म ३।२८ ) चन्द्रसूर्यावुभौ ग्रस्तावेकमासीं त्रयोदशीम् । ( भीष्म ३।३२ ) इस व्यास वचन के सूक्ष्म अनुशीलन से एक ही मास में चन्द्रग्रहण के बाद तेरहवें दिन सूर्यग्रहण सिद्ध होता है । ऐसा मानने में ही 'एकमासीं त्रयोदशीं' की सार्थकता है । अतः 'अलक्ष्यः प्रभयाहीनः पौर्णमासीं च कार्तिकीम्' से चन्द्र- ग्रहण का और 'मांसवर्षं पुनस्तीव्रमासीत् कृष्णचतुर्दशीम्' से सूर्यग्रहण का संकेत प्राप्त होता है । मार्गशीर्ष की पूर्णिमा और पौषकृष्ण अमावास्या या चतुर्दशी का उल्लेख न होने के कारण भी मार्गशीर्ष कृष्ण ही तेरह दिनों का पक्ष सिद्ध होता है । यदैकमासे ग्रहणं जायते शशिसूर्ययोः । शस्त्रकोपैः क्षयं यान्ति तदा भूपाः परस्परम् ॥ ( शीघ्रबोध ४।१६१ ) 'जो सूर्य चन्द्र का एक मास में ग्रहण हो तो राजा आपस में शस्त्र द्वारा नाश को प्राप्त हों ।।' एक पक्षे यदा यान्ति तिथयश्च त्रयोदश । त्रयस्तत्र क्षयं यान्ति वाजिनो मनुजा गजाः ॥ ( शीघ्रबोध ४।१७६ ) 'जो एक पक्ष में तेरह तिथियां हों तो हाथी, घोड़े और मनुष्य तीनों का नाश हो ।'