काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभारतसावित्री और श्री नीलकण्ठाचार्य के मत का अनुशीलन करने पर भी इसी तथ्य का प्रकाश होता है कि मार्गशीर्ष कृष्ण तेरह दिनों का पक्ष था । सप्तमाच्चापि दिवसादमावास्या भविष्यति । संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्रदेवताम् ॥ ( उद्योग० १४२।१८ ) युद्धारम्भ के सम्बन्ध में जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण का उक्त वचन मान्य है, वहाँ युद्धान्त के सम्बन्ध में श्रीबलराम जी का निम्नलिखित वचन प्रमाण है— चत्वारिंशदहान्यद्य द्वे च मे निःसृतस्य वै । पुष्येण सम्प्रयातोऽस्मि श्रवणे पुनरागतः ॥ शिष्ययोर्वै गदा युद्धं द्रष्टु कामोऽस्मि माधव । ( शल्यपर्व ३४।६-६३ ) “आप लोगों से मिलकर तीर्थयात्रा के उद्देश्य से चले हुए आज मुझे बयालीस दिन हो गये । पुष्य नक्षत्र में चला था और श्रवण में पुनः वापस आया हूँ ।। माधव ! मैं अपने दोनों शिष्यों का गदा युद्ध देखना चाहता हूँ ।'' सैन्य निर्याण के दिन श्री बलराम जी भगवान् श्रीकृष्ण और पाण्डवों से मिलकर तीर्थयात्रा के उद्देश्य से उपप्लव्य से चलकर सरस्वती के तट पर रुक गये । उन्होंने द्वारका से यात्रा के उपयुक्त ब्राह्मण, अग्नि और अन्य सामग्रियों को मंगवाकर अनुराधा नक्षत्र में तीर्थयात्रा प्रारम्भ की— युयुधानेन सहितो वासुदेवस्तु पाण्डवान् । रौहिणेये गते शूरे पुष्येण मधुसूदनः ॥ ( शल्यपर्व० ३५।१५ ) “सात्यकि सहित भगवान् श्रीकृष्ण ने पाण्डवों का पक्ष लिया । रोहिणी- नन्दन शूरवीर श्रीबलरामजी के चले जाने पर मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्ण ने पाण्डवों को आगे करके पुष्य नक्षत्र में कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान किया ।''