काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५७ ) ततो मन्युपरीतात्मा जगाम यदुनन्दनः । तीर्थयात्रां हलधरः सरस्वत्यां महायशाः ॥ मैत्रे नक्षत्र योगे स्म सहितः सर्व यादवैः । आश्रयामास भोजस्तु दुर्योधनमरिन्दमः ॥ ( शल्यपर्व० अ० ३६।१४-१५ ) श्रीबलदेव जी गदायुद्ध के समय श्रवण नक्षत्र में देवर्षि नारद से प्रेरित होकर आये । इस तरह पुष्य से श्रवणोत्तर श्रवण नक्षत्र तक उनके बयालीस दिन हो गये । अतः युद्धारम्भ के सम्बन्ध में भगवान् श्रीकृष्ण का और युद्धान्त के सम्बन्ध में श्रीबलराम जी का वचन प्रमाण मानकर विचार होना चाहिये अथवा किन्हीं एक के ही वचन को प्रमाण मानकर विचार होना चाहिये, यह मुख्य प्रश्न है । गदायुद्ध ही अन्तिम युद्ध था । उसी दिन सौप्तिक संहार भी हुआ । यह सर्वमान्य सिद्धान्त है । अतः युद्धान्त में श्रीबलदेव वचन अकाट्य प्रमाण है । 'पुष्य से चलकर आज श्रवण में आया हूँ । आज बयालीस दिन हो रहे हैं। मैं दोनों शिष्यों का गदायुद्ध देखना चाहता हूँ।' यह वचन व्यावहारिक स्थिति का ज्यों-का-त्यों अनुवाद है । अत गौणार्थक कदापि नहीं हो सकता । प्रसङ्गा- नुसार उसी दिन गदायुद्ध और सौप्तिक संहार सिद्ध भी है । अतः युद्धान्त में श्रीबलदेव वचन प्रमाण है । इसका कोई बाधक वचन भी नहीं है । अठारह दिन अब विचारणीय विषय यह है कि ज्येष्ठा से श्रवणोत्तर श्रवण बत्तीसवें स्थान पर है । 'अठारह दिनों तक युद्ध हुआ' महाभारत में एवं भारत-सावित्री में आद्योपान्त ऐसा ही उल्लेख है, लोक-प्रसिद्धि भी ऐसी ही है । अब यदि श्रवण को युद्धान्त और लगातार अठारह दिनों तक युद्ध मानकर विचार करें तो मृगशिरा से युद्धारम्भ सिद्ध होता है । श्रीनीलकण्ठाचार्य के अनुसार मार्गशीर्ष- शुक्ल चतुर्दशी मृगशिरा से पौषशुक्ल प्रतिपदा श्रवण तक युद्धकाल निश्चित होता है ।