भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( ५८ ) परन्तु ऐसा मानने पर 'सप्तमाच्चापि दिवसाद्अमावास्या भविष्यति । संग्रामो युज्यतां तस्यां............' ( उद्योग० १४२।१८ ) भगवान् श्रीकृष्ण का यह वचन अत्यन्त गौण सिद्ध होता है । क्योंकि मार्गशीर्ष अमावास्या ज्येष्ठा म मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी 'मृगशिरा' पन्द्रहवें स्थान पर है । पुष्य नक्षत्र में चली हुई सेना ज्येष्ठा में कुरुक्षेत्र पहुँची, ऐसा भी नहीं कह सकते । करोड़ों की संख्या में उपस्थित उभय पक्ष के सैनिक लगभग तीन सप्ताह में शिविरादि का निर्माण और युद्धभूमि का परिष्कार कर पाये, ऐसा भी नहीं कह सकते । साथ ही ज्येष्ठा से श्रवण तक बत्तीस दिनों में ही एक-एक दिन अवकाश देकर युद्ध हुआ, यह भी संभव नहीं । 'संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्रदेवताम्' इस श्रीकृष्ण वचन के रहते हुए मृगशिरा से रोहिणी तक युद्ध के अनारम्भ का प्रामाणिक हेतु प्रकाश में लाना चाहिये । अथवा अवकाश और अनवकाश-युक्त युद्ध की कोई प्रामाणिक रूपरेखा का अनुसन्धान करना चाहिये । श्रीभीष्मपितामह के नेतृत्व में दश दिनों तक, द्रोणाचार्य के नेतृत्व में पाँच दिनों तक, कर्ण के नेतृत्व में दो दिनों तक तथा शल्य के नेतृत्व में आधा दिन युद्ध हुआ । उसके बाद भीमसेन और दुर्योधन का गदायुद्ध हुआ । फिर सौप्तिक संहार हुआ । इस तरह अठारह दिन तक युद्ध हुआ अथवा अठारह दिनों में महाभारत युद्ध पूर्ण हुआ । परिरक्ष्य स सेनां ते दशरात्रमनीकहा । जगामास्तमिवादित्यः कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ ( भीष्मपर्व १३।११ ) युद्धं कृत्वा दिनान् पञ्च द्रोणो हत्वा वरूथिनीम् । ब्रह्मलोकं गतो राजन् ब्राह्मणो वेदपारगः ॥ ( द्रोणपर्व २०१।१०० ) युद्धं कृत्वा महद्घोरं पञ्चाहानि महाबलः । ब्राह्मणो निहतो राजन् ब्रह्मलोकमवाप्तवान् ॥ ( द्रोण० २०२।१५५ )