काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंततः पार्थं समासाद्य पतङ्ग इव पावकम् । पञ्चत्वमगमत् सौतिर्द्वितीयेऽहनि दारुणः ॥ ( आश्वमेधिक० ६०।२१ ) अवधीन्मद्रराजानं कुरुराजो युधिष्ठिरः । तस्मिंस्तदार्द्धदिवसे कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ ( आश्वमेधिक० ६०।२४ ) अथापराह्ने तस्याह्नः परिवार्य सुयोधनः । ह्रदादाहूय युद्धाय भीमसेनेन पातितः ॥ ( शल्यपर्व १।१२ ) भारत सावित्री ने भी इसी तथ्य का प्रकाश किया है-- दिनानि दश भीष्मेण भारद्वाजेन पञ्च च । दिनद्वये तु कर्णेन शल्येनार्धं दिनं तथा ॥ दिनार्धं तु गदायुद्धमेतद्भारतमुच्यते । एवमष्टादशं हन्ति अक्षौहिण्यो दिन क्रमात् ॥ ( भारत सावित्री ७९-८० ) 'अठारह अक्षौहिणी सेना और अठारह दिनों तक युद्ध' महाभारत की यह प्रसिद्धि महाभारत में ही एक श्लोक में सन्निहित है-- अष्टादश समाजग्मुरक्षौहिण्यो युयुत्सया । तन्महादारुणं युद्धमहान्यष्टादशाभवत् ॥ ( आदिपर्व २।३८१ ) अवकाश-सहित श्रवण युद्धान्त अथवा लगातार अठारह दिनों तक युद्धवाली गणनाओं की समीक्षा करने से पूर्व अवकाश के औचित्य और अनौचित्य का निर्णय परमा- वश्यक है । मूल के अनुशीलन से यह सिद्ध है कि श्री द्रोणाचार्य के नेतृत्व से लेकर दुर्योधन वध तक लगातार युद्ध हुआ । द्रोणाचार्य ने अभिमन्यु वध-तक प्रतिज्ञा