काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६० ) पूर्वक युद्ध किया । अभिमन्यु वध से क्रुद्ध अर्जुन ने जयद्रथ वध की अमोघ प्रतिज्ञा की । जयद्रथ के पश्चात् क्रुद्ध दुर्योधन ने रात्रियुद्ध की घोषणा की । उसी रात्रियुद्ध में घटोत्कच के वध से शोकार्त धर्मराज युधिष्ठिर जब कर्ण से युद्ध करने का निश्चय कर जीवन को संकट में डालकर आगे बढ़ रहे थे, तब श्री व्यासदेव ने उन्हें ऐसा करने से रोका और दिव्यदर्शिता के अमोघ प्रभाव से आँशीर्वाद देते हुए कहा— भ्रातृभिः सहितः सर्वैः पार्थिवैश्च महात्मभिः । कौरवान् समरे राजन् प्रतियुद्ध्यस्व भारत ॥ पञ्चमे दिवसे तात पृथिवी ते भविष्यति । ( द्रोणपर्व १८३।६४, ६५ ) “भरतवंशी नरेश ! तुम अपने समस्त भाइयों तथा महामना भूपालों के साथ जाकर समरभूमि में कौरवों का सामना करो । तात ! आज के पाँचवें दिन सारी पृथिवी तुम्हारी हो जायगी ।” श्रीवेदव्यासजी का उक्त वचन तभी सार्थक हो सकता है जब उसके बाद युद्ध लगातार संभव हो । तमिस्रा रात्रि के घोर अन्धकार को देखकर तथा प्रचण्ड युद्ध में उभय पक्ष को श्रमित और निद्रित देखकर प्राज्ञ पार्थ ने रात्रियुद्ध को कुछ समय के लिये विश्राम दिया । सबों ने युद्धभूमि में ही विश्राम किया । उत्तररात्रि में चन्द्रोदय के प्रकाश में पुनः युद्धारम्भ हुआ । बस, द्रोणाचार्य के नेतृत्व का अन्तिम दिन आ गया— तस्य त्वहानि चत्वारि क्षपा चैकास्यतो गता । तस्य चाह्णस्त्रिभागेन क्षयं जग्मुः पतत्रिणः ॥ ( द्रोणपर्व १९१।९ ) “उनके निरंतर बाण चलाते चार दिन और एक रात का समय बीत चुका था । उस दिन के ( पन्द्रह भागों में ) तीन ही भाग में उनके सभी बाण समाप्त हो गये ।”