भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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( ६१ ) उक्त वचन से तो स्पष्ट ही है कि श्री द्रोणाचार्य के नेतृत्व में अवकाश की बात कौन कहे, एक रात्रि-युद्ध भी हुआ । जो अवकाशयुक्त युद्ध मानते हैं, उन्हें भी चौदहवें और पन्द्रहवें दिन का युद्ध लगातार मानना पड़ता है । अब रही भीष्माचार्य के नेतृत्व में एक-एक दिन अवकाश की बात ! पितामह के नेतृत्व काल में सायंकाल चौथे दिन के अवहार के समय उनका वचन है— तन्न मे रोचते युद्धं पाण्डवैर्जितकारिभिः । घुष्यतामवहारोऽद्य श्वो योत्स्यामः परैः सह ॥ ( भीष्मपर्व ६४।७० ) “अतः विजय से सुशोभित होने वाले पाण्डवों के साथ इस समय युद्ध करना मुझे नहीं रुचता । आज युद्धविराम घोषित कर दिया जाय, कल सबेरे हम विपक्षियों से युद्ध करेंगे ।” साथ ही अवहार के बाद रात्रि बीतने पर पुनः नित्य ही युद्धारम्भ का वर्णन भी भीष्माचार्य के नेतृत्व में अवकाशयुक्त युद्ध को अप्रामाणिक सिद्ध करता है । भीष्म पतन के बाद अवकाशयुक्त युद्ध इसलिये भी असम्भव है, क्योंकि ऐसा मानने पर शेष आठ दिन का युद्ध पितामह के शरशय्या के पन्द्रह दिन सिद्ध करेगा । फिर भी विचारकों के सम्मुख यह गम्भीर प्रश्न उपस्थित होता है कि मार्गशीर्ष अमावास्या ज्येष्ठा से मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी रोहिणी तक युद्ध को अनारम्भ रखना भी अनुमान सिद्ध ही है । इस अनुमान में लगातार अठारह दिनों तक युद्ध और श्रवण में युद्धान्तरूप वचन प्रमाण है । इसी तरह यह भी कहा जा सकता है कि जैसे युद्धान्त में श्रीबलदेव वचन प्रमाण है, वैसे ही युद्धारम्भ में श्रीकृष्ण वचन प्रमाण है । न तो श्रीकृष्ण वचन के कारण बलदेव वाक्य बाधित होने योग्य है और न बलदेव वचन के कारण श्रीकृष्ण वचन ही बाधित होने योग्य है । साथ ही एक-एक दिन अवकाशयुक्त युद्ध भी असम्भव है । इधर द्रोणाचार्य के नेतृत्व से लेकर युद्धान्त तक प्रतिज्ञा-

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