भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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( ६२ ) बद्ध है दैनिक युद्ध का उल्लेख है, अतः इस अवधि में भी अवकाशयुक्त युद्ध की धारणा असिद्ध है। अस्तु ! श्रीभीष्माचार्य के नेतृत्व में लगातार युद्ध की सामान्य सिद्धि, श्रीकृष्ण भगवान् के विशेष वचन के बल पर बाधित होने के योग्य माना जा सकता है। क्योंकि जैसे श्रीकृष्ण भगवान् के उपप्लव्य से हस्तिनापुर प्रस्थान और पुनः हस्तिनापुर से उपप्लव्य आने तक केवल तीन दिनों का विवरण प्राप्त है, परन्तु वह सामान्य विवरण प्रयाध्वं वै कुरु- क्षेत्रं पुष्योद्येति पुनः पुनः' इस श्रीकृष्ण मुख निर्गत दुर्योधन वाक्य से बाधित हो जाता है, वैसे ही भीष्माचार्य के नेतृत्व में दैनिक युद्ध सम्बन्धी सामान्य वचन श्रीकृष्ण वचन से बाधित होकर उसका अभिप्राय 'आगामी युद्ध काल अर्थात् एक दिन अवकाश के बाद' ग्राह्य है। परन्तु ऐसा मानने पर भी मार्गशीर्ष अमावस्या ज्येष्ठा में युद्धारम्भ नहीं सिद्ध होता। कदाचित् इस दिन सैन्य शिक्षण और युद्धधर्म मर्यादा निर्धारण मानें तो भी मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा को युद्धारम्भ नहीं सिद्ध होता, क्योंकि ऐसा मानने पर मार्गशीर्ष पूर्णिमा आर्द्रा में आठवें दिन का युद्ध सिद्ध होगा। महाभारत के अनुसार उस दिन प्रदोष काल में अन्धकार होना चाहिये— रजनी मुखे सुरौद्रे तु वर्तमाने महाभये। अवहारं ततः कृत्वा सहिताः कुरुपाण्डवाः॥ न्यविशन्ति यथाकालं गत्वा स्वशिविरं तदा ॥ (महा० भीष्म० ९६।८०) ‘फिर महाभयानक तथा अत्यन्त रौद्र रूप वाले प्रदोष काल में कौरव तथा पाण्डव एक साथ अपनी सेनाओं को लौटाकर यथासमय शिविर में जा पहुँचे और विश्राम करने लगे ॥' साथ ही मार्गशीर्ष शुक्ल द्वितीया पूर्वाषाढा से युद्धारम्भ मानने पर यद्यपि आठवें दिन के युद्ध में पौषकृष्ण द्वितीया प्राप्त होती है, परन्तु उस दिन भी प्रदोष काल में, 'रजनीमुखे सुरौद्रे तु वर्तमाने महाभये' यह लक्षण आंशिक ही घटित होता है।