भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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( ६३ ) साथ ही ऐसा मानने पर भी दो तिथियों और नक्षत्र को या तो पौषकृष्ण को त्रयोदश दिनों का पक्ष मानकर पूर्ण करना होगा अथवा मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी श्रवण से युद्धारम्भ मानकर द्रोणाभिषेक पर्यन्त अवकाश युक्त युद्ध मानना होगा। मार्गशीर्ष कृष्ण में ही दो तिथियों का क्षय संभव और पौषकृष्ण में असम्भव सिद्ध होने पर उक्त रीति से श्रवण से श्रवण तक युद्धकाल मान्य होगा। परन्तु भीष्म पतन के बाद अवकाश के दिन शरशय्या में सम्मिलित होने के कारण युद्ध तुल्य सिद्ध होंगे। अतः मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी श्रवण में युद्धधर्म मर्यादा निर्धारण और शुक्ल पञ्चमी धनिष्ठा में गीता जयन्ती एवं युद्धारम्भ मानना उपयुक्त है। पौषकृष्ण चतुर्थी में आठवें दिन का युद्ध, पौषकृष्ण अष्टमी चित्रा में भीष्म पतन और उसके पश्चात् पौषशुक्ल प्रतिपदा श्रवण तक अनवरत युद्ध उपयुक्त परिलक्षित होता है। इस दृष्टि से पौषकृष्ण द्वादशी में जयद्रथ वध तथा त्रिभागशेष उत्तर रात्रि में चन्द्रोदय और युद्धारम्भ एवं पौषशुक्ल प्रतिपदा में युद्धान्त सिद्ध होता है। इस पक्ष में मार्गशीर्ष अमावास्या ‘ज्येष्ठा’ में स्वस्तिवाचन आदि माङ्गलिक कृत्य और सीमा निर्धारण आदि तथा मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा मूल नक्षत्र से मार्गशीर्ष शुक्ल तृतीया उत्तराषाढ़ा तक सैन्य शिक्षण सिद्ध होता है। 'मांसवर्षं पुनस्तीव्रमासीत् कृष्ण चतुर्दशीम्' ( भीष्म० ३।३३ ) इस व्यास वचन में आसीत् का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी ( अमावास्या ) के बाद श्री व्यास भगवान् ने धृतराष्ट्र को उद्बोधित करते हुए संजय को दिव्य-दृष्टि प्रदान किया। पुनः— ततः पूर्वापरे सैन्ये समीक्ष्य भगवानृषिः । सर्ववेदविदां श्रेष्ठो व्यासः सत्यवती सुतः ॥ भविष्यति रणे घोरे भरतानां पितामहः । प्रत्यक्षदर्शी भगवान् भूतभव्य भविष्यवित् ॥ वैचित्र वीर्यं राजानं सरहस्यं ब्रवीदिदम् । शोचन्तमातं ध्यायन्तं पुत्राणामनयं तदा ॥ ( भीष्म २।१-३ )