काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६९ ) उत्तरार्द्ध में मिथुन का चन्द्र माना जाय, वृष के शुक्र और मिथुन के बुध अधिपति होने के कारण आसुर शक्ति की पराजय और देवशक्ति का अभ्युदय सूचक मृगशिरा में ही युद्धारम्भ माना जाय तो नक्षत्र के अनुगुण चतुर्दशी या पूर्णिमा तिथि भी मान्य होगी । साथ ही यह प्रश्न उपस्थित होगा कि राशिगत पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध भेद तो पुनर्वसु आदि नक्षत्रों का भी हो सकता है, फिर मृगशिरा का ही क्यों माना जाय ? द्वितीय आपत्ति यह है कि स्वयं भारत सावित्री को भी यमदैवत नक्षत्र—'मृगशिरा' अमान्य है ? 'फाल्गुन्यां निहतो भीष्मः कृष्णपक्षे च सप्तमी ।' इस भारत वचन से तो यही सिद्ध होता है कि फाल्गुनी नक्षत्र में भीष्म पतन हुआ । पूर्वाफाल्गुनी भरणी के बाद ठीक नवें स्थान पर है । अतः ऐसा तभी संभव है जब भरणी में युद्धारम्भ हो । मृगशिरा में युद्धारम्भ मानने पर चित्रा में भीष्म पतन होना चाहिये । अतः दस दिनों के भीतर ही तीन-तीन नक्षत्रों की हानि सर्वथा असंभव है । अस्तु ! युद्धारम्भ के सम्बन्ध में ही नहीं; अभिमन्युवध, जयद्रथवध, भगदत्तवध, वृषसेनवध सम्बन्धी भारत सावित्री का दिन भी मूल के विरुद्ध है । महाभारत के अनुसार अभिमन्युवध तेरहवें दिन के युद्ध में होना चाहिये न कि ग्यारहवें दिन, इसी तरह जयद्रथवध चौदहवें दिन होना चाहिये न कि बारहवें दिन, इसी प्रकार भगदत्तवध बारहवें दिन होना चाहिये न कि तेरहवें दिन, वृषसेनवध सत्रहवें दिन होना चाहिये न कि सोलहवें दिन । श्रीनीलकण्ठाचार्य श्री महाभारत के प्रसिद्ध टीकाकार श्रीनीलकण्ठाचार्य के-मत में महाभारत युद्ध मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी मृगशिरा में आरम्भ होता है और पौष शुक्ल प्रतिपदा श्रवण में अन्त होता है । तिथि, नक्षत्र, मास गणना की दृष्टि से यह पक्ष सर्वोत्तम है । यथा स भगवान् व्यासः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् । तथैव सहिताः सर्वे समाजग्मुर्महीक्षितः ॥