काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७१ ) हुआ, जयद्रथवध तथा रात्रियुद्ध कृष्ण १० अनुराधा में, द्रोणवध कृष्ण ११ ज्येष्ठा में, कर्णवध कृष्ण १३ पूर्वाषाढ़ा में, शल्यवध कृष्ण १४ उत्तराषाढ़ा में तथा उसी दिन सायंकाल भीम-दुर्योधन गदायुद्ध हुआ । 'भारतीय युद्धकाल निर्णय' (मराठी) के लेखक प्रो० र० वि० वैद्य (१९६४) पुनर्वसु-पुष्य में युद्धारम्भ मानते हैं। इनके अनुसार युद्ध केवल सोलह दिनों का था। इनका यह भी कहना है कि भीष्म निधन शुक्लपक्ष में कदापि नहीं हो सकता । परन्तु युद्धारम्भ और युद्धान्त में श्रीनीलकण्ठाचार्य का 'स्वमत' ही प्रामाणिक सिद्ध होता है। निष्कर्ष जो महानुभाव भगवान् श्रीकृष्ण के 'सप्तमाच्चापि दिवसाद्अमावास्या भवि- ष्यति । संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्र देवताम् ।' ( उद्योग० १४२।१८ ) केवल इस वचन को प्रमाण मानकर मार्गशीर्ष अमावास्या ज्येष्ठा में युद्धारम्भ मानकर अठारहवें दिन महाभारत युद्ध की समाप्ति मानते हैं, उनके मत में एक तो 'पुष्येण सम्प्रयातोऽस्मि श्रवणे पुनरागतः' ( शल्य० ३४।६ ) इस बलदेव- वाक्य के अनुसार सैन्य निर्याण से युद्ध समाप्ति तक बयालीस दिनों की पूर्ति नहीं हो पाती, साथ ही श्रवण नक्षत्र में युद्धान्त नहीं हो पाता और आठवें, नौवें दिन सन्ध्याकाल में अन्धकार सम्बन्धी संकेत एवं चौदहवें दिन रात्रियुद्ध के पश्चात् तीन-चार मुहूर्त्त रात्रि शेष रहने पर चन्द्रोदय का स्पष्ट उल्लेख भी सर्वथा अपूर्ण ही रहता है— ततो मुहूर्ताद् भुवनं ज्योतिर्भूतमिवाभवत् । अप्रख्यमप्रकाशं च जगामाशु तमस्तथा ॥ ( द्रोणपर्व १५४।५२ ) त्रिभागमात्र शेषायां रात्र्यां युद्धमवर्तत । कुरूणां पाण्डवानां च संहृष्टानां विशांपते ॥ ( द्रोणपर्व १८६।१ )