भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

( ७२ ) जो महानुभाव भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम दोनों के वचन अक्षरशः सत्य सिद्ध करने के उद्देश्य से मार्गशीर्ष अमावस्या से एक-एक दिन अवकाश युक्त किन्तु चौदहवें और पन्द्रहवें दिन का युद्ध लगातार मानते हुए श्रवण में युद्धान्त मानते हैं, वे महाभारत के अत्यन्त प्रामाणिक वचनों के सर्वथा विरुद्ध अवकाश की कल्पना कर वस्तुस्थिति से सुदूर चले जाते हैं । इन सब दृष्टियों से श्रीनीलकण्ठाचार्य का मत नक्षत्र गणना, नक्षत्र के अनुगुण तिथि गणना और युद्धारम्भ एवं युद्धान्त की दृष्टि से सर्वथा निर्दोष परिलक्षित होता है । अवश्य ही आचार्य ने युद्धारम्भ और युद्धान्त को भारत- सावित्री के अनुसार और श्रवण में युद्धान्त को महाभारत के अनुसार सिद्ध करने में समन्वय की जो रूपरेखा प्रस्तुत की है, वह पूर्णरूपेण ग्राह्य नहीं कही जा सकती । गीता जयन्ती जो कि आजकल मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के रूप में प्रसिद्ध है, इसकी प्रामाणिकता भी श्रवण नक्षत्र में युद्धान्त को देखते हुए खण्डित हो जाती है । भारत सावित्री के अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी यद्यपि युद्धारम्भ की तिथि सिद्ध होती है, तथापि श्रवण नक्षत्र में युद्धान्त की दृष्टि से इसकी भी पूर्ण प्रामाणिकता नहीं सिद्ध होती । केवल भीष्माचार्य के नेतृत्व में अवकाश और अन्यत्र अनवकाश मानकर नक्षत्रादि गणना के सर्वथा अनुरूप मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चमी से युद्धारम्भ वाला इस ग्रन्थ में निर्दिष्ट पक्ष भी अवकाश-अनवकाश के साङ्कर्य की दृष्टि से सन्दिग्ध कहा जा सकता है । परन्तु यह सर्वथा निर्विवाद है कि महाभारत युद्ध ऐतिहासिक है, काल्प- निक नहीं । साथ ही महाभारत के अनुसार सर्वमान्य युद्धकाल प्राप्त होना भी कठिन है । हाँ इतना ही कहा जा सकता है कि कृष्णादि मासानुसार मार्गशीर्ष में युद्धारम्भ हुआ । यह भी कहा जा सकता है कि द्रोण, कर्ण और शल्य के नेतृत्व काल में अवकाशरहित ही युद्ध हुआ । 'श्वो योत्स्यामः परैः सह' ( भीष्म० ६४।७० ) इस भीष्मवचन के अनुसार यह भी मान्य हो सकता है

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