काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकि भीष्म के नेतृत्वकाल में भी लगातार ही युद्ध हुआ । अतः 'सप्तमाच्चापि दिवसात्' ( उद्योग० १४२।१८ ) इस श्रीकृष्णवचन को इस अर्थ में ग्रहण करना आवश्यक है कि युद्धारम्भ सम्बन्धी आवश्यक कृत्यों में उक्त समय का उपयोग हुआ । ऐसा मान लेने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी, त्रयोदशी या चतुर्दशी में युद्धारम्भ हुआ । अतः मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी से चतुर्दशी या पूर्णिमा तक गीता जयन्ती के उपलक्ष में महोत्सव मनाये जायें । समय और धनादि के अभाव में एकादशी, त्रयोदशी या चतुर्दशी किसी एक तिथि में अथवा केवल एकादशी में ही गीता जयन्ती मनाना भी उत्तम है । यद्यपि प्रामाणिक तिथि मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी ही सिद्ध होती है । भीष्म निर्वाण सौप्तिक संहार के पश्चात् उषःकाल में दुर्योधन के देह त्याग के अनन्तर संजय हस्तिनापुर गये । पुनः धृतराष्ट्र की प्रेरणा से धर्मराज युधिष्ठिर ने मृतकों के सामूहिक दाह आदि की व्यवस्था की । उन्होंने जलाञ्जलि के पश्चात् मासमात्र गंगा तट पर निवास किया— कृतोदकास्ते सुहृदां सर्वेषां पाण्डुनन्दनाः । विदुरो धृतराष्ट्रश्च सर्वाश्च भारतस्त्रियः ॥ तत्र ते सुमहात्मानो न्यवसन् पाण्डुनन्दनाः । शौचं निर्वर्तयिष्यन्तो मासमात्रं बहिःपुरात् ॥ ( शान्तिपर्व १।१–२ ) पुनः सभी हस्तिनापुर आये । धर्मराज युधिष्ठिर का भगवान् श्रीकृष्ण के नेतृत्व में राज्याभिषेक सम्पन्न हुआ । यथायोग्य महलों में पाण्डवों ने निवास किया । पुनः भगवान् श्रीहरि की प्रेरणा से भीष्माचार्य के श्रीमुख से उपदेश श्रवण की अभिलाषा से धर्मराज निज परिकर सहित पितामह की सेवा में कुरुक्षेत्र उपस्थित हुए । श्रीभगवान् ने दिव्यशक्ति और दिव्यदृष्टि से देवव्रत