काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७५ ) स निर्ययौ गजपुराद् याजकैः परिवारितः । दृष्ट्वा निवृत्तमादित्यं प्रवृत्तं चोत्तरायणम् ॥ ( अनुशा० १६७।५-६ ) निज सेवा में समुपस्थित धर्मराज से पितामह ने कहा— अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः शयानस्याद्य मे गताः । शरेषु निशिताग्रेषु यथा वर्षशतं तथा ॥ माघोऽयं समनुप्राप्तो मासः सौम्यो युधिष्ठिर । त्रिभागशेषः पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति ॥ ( अनुशा० १६७।२७-२८ ) ‘इन तीखे अग्रभाग वाले बाणों की शय्या पर शयन करते हुए आज मुझे अट्ठावन दिन हो गये, किन्तु ये दिन मेरे लिये सौ वर्षों के समान बीते हैं ।’ ‘युधिष्ठिर ! इस समय सौम्य माघ का महीना प्राप्त है । त्रिभाग शेष है, यह शुक्ल पक्ष है ।’ अब विचार करना है कि ‘मास मात्र’, ‘पञ्चाशत षट्’, ‘पञ्चाशत्’ और ‘अष्ट पञ्चाशतं’ ये सब “माघोऽयं समनुप्राप्तो मासः सौम्यो युधिष्ठिरः । त्रिभाग- शेषः पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति ॥” इस भीष्मवचन के अनुसार माघ शुक्ल की सीमा में होने पर ही सार्थक हैं । अतः माघ से आगे इनकी गति अमान्य है । इधर ‘पञ्चाशतं’ का प्रसिद्ध अर्थ पचास, ‘पञ्चाशतं षट्’ का छप्पन और ‘अष्टपञ्चाशतं’ का अट्ठावन होता है । ऐसी स्थिति में शरशय्या के तीसरे दिन ही जब श्रीहरि पितामह से उनके छप्पन दिन शेष की बात कर रहे हों तभी वाच्यार्थ में श्रीकृष्ण वचन प्रमाण हो सकता है । परन्तु मूल के अनुशीलन से ही यह सिद्ध होता है कि युद्धान्त तक भीष्मजी के शरशय्या पर कम-से-कम ( बिना अवकाश के ) नौ दिन हुए । पुनः पाण्डवों ने मासमात्र नगर के बाहर नदी तट पर निवास किया । तत्पश्चात् हस्तिनापुर में श्राद्ध एवं राज्या- भिषेकादि में व्यतीत हुआ । कुछ दिन यथायोग्य महलों में निवास किया । अतः कम-से-कम तीन-चार दिन हस्तिनापुर में व्यतीत हुए । इस तरह