काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७६ ) ९ + ३० + ४ = ४३ दिन भीष्माचार्य के पास पहुँचने में लगे । अतः उसके बाद भीष्मजी के छप्पन दिन शेष मानें तो ४३ + ५६ = ९९ दिन होते हैं । इधर माघ की अवधि, उधर पौष में अधिमास असंभव । उत्तरायण की प्रतीक्षा देखते हुए माघ में अधिमास की कल्पना भी निरर्थक । इन सब दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण प्रश्न उपस्थित होता है कि 'मासमात्रं', 'पञ्चाशतं षट्', 'पञ्चाशत्' और 'अष्टपञ्चाशतं' सबको माघोऽयं समनुप्राप्तः मासः सौम्यः' के अनुगुण घटाया जाय ? अथवा 'अष्टपञ्चाशतं रात्र्यः' का अट्ठावन दिन अर्थ ग्रहण कर उसी के अनुरूप 'मासमात्रं', 'पञ्चाशतं षट्', 'पञ्चाशतं' और 'त्रिभागशेषः' को लगाया जाय । किसी भी दृष्टि से माघ का अतिक्रमण सर्वथा अनुपयुक्त है । अतः माघ की सीमा में रहते हुए भी उक्त पक्षों पर विचार अपेक्षित है । परन्तु किसी भी पक्ष को स्वीकार करने से पूर्व भीष्म पतन की प्रामाणिक तिथि प्राप्त होना परमावश्यक है । श्रीकवीश्वर, जो कि चित्रा को ऐन्द्र नक्षत्र मानकर मार्गशीर्ष अमावास्या से युद्धारम्भ मानते हैं, उनके मत में पौष कृष्ण तृतीया भीष्म पतन की तिथि है । प्रचलित गीता जयन्ती के अनुसार पौषकृष्ण ❀ षष्ठी में भीष्मपतन सिद्ध होता है । भारत सावित्री के अनुसार पौषकृष्ण सप्तमी में भीष्मपतन सिद्ध होता है । श्रीनीलकण्ठाचार्य के अनुसार गीता जयन्ती मानने पर पौषकृष्ण अष्टमी को भीष्मपतन सिद्ध होता है । मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चमी को युद्धारम्भ मानने पर पौषकृष्ण अष्टमी में भीष्म- पतन सिद्ध होता है । मार्गशीर्ष अमावास्या ज्येष्ठा से भीष्माचार्य के नेतृत्वकाल में अवकाश युक्त युद्ध मानने पर पौषकृष्ण तृतीया को शरशय्या का प्रथम दिन सिद्ध होता है । इस तरह-- ♣ त्रयोदश ( तेरह ) दिन का पक्ष